Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 22

60 Mantra
29/22
Devata- वायवो देवताः Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॒ शरी॑रं पतयि॒ष्ण्वर्व॒न्तव॑ चि॒त्तं वात॑ऽइव॒ ध्रजी॑मान्। तव॒ शृङ्गा॑णि॒ विष्ठि॑ता पुरु॒त्रार॑ण्येषु॒ जर्भुराणा चरन्ति॥२२॥

तव॑। शरी॑रम्। प॒त॒यि॒ष्णु। अ॒र्व॒न्। तव॑। चि॒त्तम्। वात॑ इ॒वेति॒ वातः॑ऽइव। ध्रजी॑मान्। तव॑। शृङ्गा॑णि। विष्ठि॑ता। विस्थि॒तेति॒ विऽस्थि॑ता। पु॒रु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा। अर॑ण्येषु। जर्भु॑राणा। च॒र॒न्ति॒ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
तव शरीरम्पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तँवातऽइव ध्रजीमान् । तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति ॥

तव। शरीरम्। पतयिष्णु। अर्वन्। तव। चित्तम्। वात इवेति वातःऽइव। ध्रजीमान्। तव। शृङ्गाणि। विष्ठिता। विस्थितेति विऽस्थिता। पुरुत्रेति पुरुऽत्रा। अरण्येषु। जर्भुंराणा। चरन्ति॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे अर्वन् = वासनाओं का संहार करनेवाले जीव! तव शरीरम् - तेरा यह शरीर पतयिष्णु-गति के स्वभाववाला हो, अर्थात् क्रिया तेरे अङ्ग-प्रत्यङ्ग का स्वभाव बन जाए । तू सब अङ्गों से गतिशील बन। २. तव चित्तम्-तेरा चित्त वात इव वायु की भाँति ध्रजीमान्-गति व वेगवाला है। यह सूक्ष्म से सूक्ष्म विषय के प्रति जानेवाला है। तेरा चित्त कभी शिथिल नहीं होता। ३. तव शृङ्गाणि तेरी ज्ञान दीप्तियाँ (शृङ्गम् इति ज्वलतो नामधेयम्) पुरुत्रा=विद्युत्, चन्द्र, सूर्य, अग्नि आदि अनेक विषयों में विष्ठिता = विशेषरूप से स्थित हैं, अर्थात् तेरा ज्ञान व्यापक है । ४. यह तेरा शरीर, यह तेरा चित्त तथा ये तेरा ज्ञान अरण्येषु = एकान्त स्थानों में, उस प्रभु के ध्यान के द्वारा जर्भुराणा- (जर्भुराणानि ) देदीप्यमान व (जृम्भ विकसने) विकसित होकर चरन्ति अपना-अपना कार्य करते हैं।
Essence
भावार्थ- प्रभु के उपासन से शरीर की गतिशीलता, चित्त की विज्ञान-कुशलता व विकसित होती है। ज्ञानदीप्तियों की विविधता
Subject
पतयिष्णु-ध्रजीमान्