Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 16

60 Mantra
29/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मा ते॑ वाजिन्नव॒मार्ज॑नानी॒मा श॒फाना॑ सनि॒तुर्नि॒धाना॑।अत्रा॑ ते भ॒द्रा र॑श॒नाऽअ॑पश्यमृ॒तस्य॒ याऽअ॑भि॒रक्ष॑न्ति गो॒पाः॥१६॥

इ॒मा। ते॒ वा॒जि॒न्। अ॒व॒मार्ज॑ना॒नीत्य॑व॒ऽमार्ज॑नानि। इ॒मा। श॒फाना॑म्। स॒नि॒तुः। नि॒धानेति॑ नि॒ऽधाना॑। अत्र॑। ते॒। भ॒द्राः। र॒श॒नाः। अ॒प॒श्य॒म्। ऋ॒तस्य॑। याः। अ॒भि॒रक्ष॒न्तीत्य॑भि॒ऽरक्ष॑न्ति। गो॒पाः ॥१६ ॥

Mantra without Swara
इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफानाँ सनितुर्निधाना । अत्रा ते भद्रा रशनाऽअपश्यमृतस्य याऽअभिरक्षन्ति गोपाः ॥

इमा। ते वाजिन्। अवमार्जनानीत्यवऽमार्जनानि। इमा। शफानाम्। सनितुः। निधानेति निऽधाना। अत्र। ते। भद्राः। रशनाः। अपश्यम्। ऋतस्य। याः। अभिरक्षन्तीत्यभिऽरक्षन्ति। गोपाः॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में वर्णित व्रत मनुष्य को शक्तिशाली बनाते हैं, अतः उस व्रती का सम्बोधन ही 'वाजिन्' शब्द से करते हैं। हे (वाजिन्) = शक्तिशालिन् ! (इमा) = ये व्रत ही (ते) = तेरे अवमार्जनानि पापों का शोधन करनेवाले हो जाते हैं। व्रतों से जीवन पवित्र होता है। २. (इमा) = ये व्रत (सनितुः) = संविभागपूर्वक अन्नादि का सेवन करनेवाले व्रती पुरुष के जीवन में (शफानाम्) =[शम्]=शान्ति के (निधाना) = स्थापित करनेवाले होते हैं। व्रती पुरुष संविभागपूर्वक खाने को अपना महान् व्रत समझता है। यह संविभागपूर्वक खाना ही शान्ति का कारण बनता है। संसार के अन्दर 'परिग्रह'- सब कुछ अपने लिए जुटाने की प्रवृत्ति ही संघर्षों व अशान्तियों का कारण है। ३. (अत्र) = यहाँ इस व्रती जीवन में ही (ते) = तेरी (भद्रा) = कल्याणकर (रशना) = मेखला को (अपश्यम्) = देखता हूँ। रशना वा मेखला शब्द दृढ़ निश्चय के प्रतीक हैं। (या:) = जो मेखलाएँ व दृढ़ निश्चय (ऋतस्य अभिरक्षन्ति) = ऋत का रक्षण करते हैं। दृढ़ निश्चय होने पर मनुष्य ऋत से गिरता नहीं। (गोपाः) = ये निश्चय ही इन्द्रियों का रक्षण करते हैं। विषय इतने सुन्दर व आकर्षक हैं कि ये इन्द्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर ही लेते हैं। बड़ा दृढ़ निश्चय होने पर ही मनुष्य अपने को विषयपङ्क में डूबने से रोक पाता है।
Essence
भावार्थ- व्रत हमें पवित्र बनाते हैं, ये हमारी शान्ति के निधान हैं। इन व्रतों में किये हुए दृढ़ निश्चय हममें ऋत का रक्षण करते हैं और इन्द्रियों को सुरक्षित करते हैं।
Subject
व्रतों के लाभ