Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 13

60 Mantra
29/13
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒मेन॑ द॒त्तं त्रि॒तऽए॑नमायुन॒गिन्द्र॑ऽएणं प्रथ॒मोऽअध्य॑तिष्ठत्।ग॒न्ध॒र्वोऽअ॑स्य रश॒नाम॑गृभ्णा॒त् सूरा॒दश्वं॑ वस॒वो निर॑तष्ट॥१३॥

य॒मेन॑। द॒त्तम्। त्रि॒तः। ए॒न॒म्। आ॒यु॒न॒क्। अ॒यु॒न॒गत्य॑युनक्। इन्द्रः॑। ए॒न॒म्। प्र॒थ॒मः। अधि॑। अ॒ति॒ष्ठ॒त्। ग॒न्ध॒र्वः। अ॒स्य॒। र॒श॒नाम्। अ॒गृ॒भ्णा॒त्। सूरा॑त्। अश्व॑म्। व॒स॒वः। निः। अ॒त॒ष्ट॒ ॥१३ ॥

Mantra without Swara
यमेन दत्तन्त्रितऽएनमायुनगिन्द्रऽएणम्प्रथमोऽअध्यतिष्ठत् । गन्धर्वाऽअस्य रशनामगृभ्णात्सूरादश्वँवसवो निरतष्ट ॥

यमेन। दत्तम्। त्रितः। एनम्। आयुनक्। अयुनगत्ययुनक्। इन्द्रः। एनम्। प्रथमः। अधि। अतिष्ठत्। गन्धर्वः। अस्य। रशनाम्। अगृभ्णात्। सूरात्। अश्वम्। वसवः। निः। अतष्ट॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यमेन) = सृष्टि के नियामक प्रभु से (दत्तम्) = दिये हुए (एनं अश्वम्) = इस इन्द्रियरूप अश्व को (त्रितः) [त्रीन् तनोति] = ज्ञान, कर्म व उपासना का विस्तार करनेवाला यह त्रित (आयुनक्) = ज्ञान, कर्म व उपासना में लगाता है, अथवा इस शरीररूप रथ में जोतता है। वस्तुतः इन ज्ञानादि में लगे रहने पर ही यह इन्द्रियाश्व हमारे वशीभूत होता है, इसका हम नियमन कर पाते हैं । २. (प्रथमः) = अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (एणं अध्य तिष्ठत्) = इसपर अधिष्ठित होता है, इसको वशीभूत करता है। ३. (गन्धर्वः) = [गां वदेवाचं धारयतीति] वेदवाणी का धारक ज्ञानी पुरुष (अस्य) = इस इन्द्रियाश्व की (रशनाम्) = मनरूपी लगाम को (अगृभ्णात्) = ग्रहण करता है। मन को ज्ञानप्राप्ति में लगाये रखना ही वह उपाय है जिससे यह इन्द्रियाश्व हमारे वश में रहता है। ४. (सूरात्) = सूर्य से (अश्वम्) = इस इन्द्रियाश्व को (वसवः) = उत्तम निवासवाले लोग निरतष्ट बनाते हैं। सूर्य जैसे निरन्तर चल रहा है उसी प्रकार निरन्तर गति के द्वारा इन इन्द्रियाश्वों का निर्माण होता है। क्रियाशून्यता से इनकी शक्ति क्षीण हो जाती है।
Essence
भावार्थ-त्रित इन्द्रियाश्वों को जोतता है, इन्द्र इसका अधिष्ठाता बनता है, गन्धर्व इसकी लगाम पकड़ता है, वसु इसका निर्माण करते हैं। 'त्रित' इन अश्वों को 'ज्ञान, कर्म व उपासना' में लगाये रखता है। 'इन्द्र' जितेन्द्रिय इन्हें वश में करता है 'ज्ञान में लगा पुरुष' इनकी लगाम को थामता है और 'निवास को उत्तम बनानेवाले' क्रियाशीलता द्वारा इन्हें सशक्त बनाते हैं।
Subject
त्रित, इन्द्र, गन्धर्व तथा वसु