Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 12

60 Mantra
29/12
Devata- यजमानो देवता Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदक्र॑न्दः प्रथ॒मं जाय॑मानऽउ॒द्यन्त्स॑मु॒द्रादु॒त वा॒ पुरी॑षात्।श्ये॒नस्य॑ प॒क्षा ह॑रि॒णस्य॒ बा॒हूऽउ॑प॒स्तुत्यं॒ महि॑ जा॒तं ते॑ऽअर्वन्॥१२॥

यत्। अक्र॑न्दः। प्र॒थ॒मम्। जाय॑मानः। उ॒द्यन्नित्यु॒त्ऽयन्। स॒मु॒द्रात्। उ॒त। वा॒। पुरी॑षात्। श्ये॒नस्य॑। प॒क्षा। ह॒रि॒णस्य॑। बा॒हूऽइति॑ बा॒हू। उ॒प॒स्तुत्य॒मित्यु॑प॒ऽस्तुत्य॑म्। महि॑। जा॒तम्। ते॒ अ॒र्व॒न् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
यदक्रन्दः प्रथमञ्जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात् । श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहूऽउपस्तुत्यम्महि जातन्तेऽअर्वन् ॥

यत्। अक्रन्दः। प्रथमम्। जायमानः। उद्यन्नित्युत्ऽयन्। समुद्रात्। उत। वा। पुरीषात्। श्येनस्य। पक्षा। हरिणस्य। बाहूऽइति बाहू। उपस्तुत्यमित्युपऽस्तुत्यम्। महि। जातम्। ते अर्वन्॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अब अध्याय के अन्त तक मन्त्र 'भार्गवजमदग्नि' के हैं। 'भृगु का अपत्य' भार्गव है, अपने ज्ञान को पूर्ण परिपाक करनेवाला [ भ्रस्ज पाके]। जिसके वहाँ अग्नियाँ जीमती हैं, अग्नियों को हव्य पदार्थ प्राप्त होते हैं, वह 'जमदग्नि' है। यह निमयपूर्वक अग्निहोत्रादि करनेवाला है। यह (समुद्रात्) = ज्ञान के समुद्र आचार्य से ['तपोऽतिष्ठत् तप्यमानः समुद्रे 'तप करता हुआ आचार्य के समीप रहता है] । उद्यन् उदय को प्राप्त होता हुआ उत वा तथा पुरीषात् = [पृ पालनपूरणयोः] तीनों आश्रमियों का पालन व पूरण करनेवाले इस गृहस्थाश्रम से (उद्यन्) = उदय को प्राप्त करता हुआ (यत्) = जो (जायमानः) = प्रतिदिन निद्रा की समाप्ति पर आविर्भूत जीवनवाला होता हुआ, अर्थात् जागरितावस्था में आता हुआ (प्रथमम्) = सबसे पहले, किसी भी अन्य क्रिया को करने से पहले (अक्रन्दः) = प्रभु का आह्वान करता है [क्रदि आह्वाने] २. इसके (पक्षौ) [ पक्ष परिग्रहे ] = ज्ञान व उपासनारूप पंख (श्येनस्य) = [श्यैङ गतौ ] बाज़ की भाँति गतिशील होते हैं, अर्थात् इसका ज्ञान इसे कर्म में प्रवृत्त करता है और यह कर्मों द्वारा ही प्रभु की उपासना करता है । ३. इसकी (बाहू) = बाहुएँ, भुजाएँ (हरिणस्य) = हरिण की भाँति दुःखों के हरण करनेवाले पुरुष की होती हैं, अर्थात् ये अपने प्रयत्नों से औरों के दुःख दूर करने में लगे रहते हैं। ४. हे (अर्वन्) = [अर्व to kill] प्रभु स्मरण के द्वारा कर्मों में लगे रहने के द्वारा तथा लोकहित में प्रवृत्ति से वासनाओं के संहार करनेवाले जीव ! (ते) = तेरा यह सब कर्म (महि उपस्तुत्यम्) = बड़ा स्तुति के योग्य जातम् हो गया है, अर्थात् इस मार्ग पर चलने से तुझे यश ही यश मिला है।
Essence
भावार्थ- उठते ही हम प्रभु-स्तवन करें, आचार्य के समीप रहकर उन्नति को प्राप्त करें, गृहस्थ में सभी का पालन-पोषण करते हुए हम उन्नत हों। हमारा ज्ञान व उपासन हमें गतिशील बनाएँ। हमारे प्रयत्न औरों का दुःख हरण करने के लिए हों। इस प्रकार वासनाओं का संहार करने पर हमारा जीवन उत्तम होगा।
Subject
अर्वा