Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 1

60 Mantra
29/1
Devata- अग्निर्देवता Rishi- बृहदुक्थो वामदेव्य ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑द्धोऽअ॒ञ्जन् कृद॑रं मती॒नां घृ॒तम॑ग्ने॒ मधु॑म॒त् पिन्व॑मानः।वा॒जी वह॑न् वा॒जिनं॑ जातवेदो दे॒वानां॑ वक्षि प्रि॒यमा स॒धस्थ॑म्॥१॥

समि॑द्ध॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धः। अ॒ञ्जन्। कृद॑रम्। म॒ती॒नाम्। घृ॒तम्। अ॒ग्ने॒। मधु॑म॒दिति॒ मधु॑ऽमत्। पिन्व॑मानः। वा॒जी। वह॑न्। वा॒जिन॑म्। जा॒त॒वे॒द॒ इति॑ जातऽवेदः। दे॒वाना॑म्। व॒क्षि॒। प्रि॒यम्। आ। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म् ॥१ ॥

Mantra without Swara
समिद्धो अञ्जन्कृदरम्मतीनाङ्घृतमग्ने मधुमत्पिन्वमानः । वाजी वहन्वाजिनञ्जातवेदो देवानाँवक्षि प्रियमा सधस्थम् ॥

समिद्ध इति सम्ऽइद्धः। अञ्जन्। कृदरम्। मतीनाम्। घृतम्। अग्ने। मधुमदिति मधुऽमत्। पिन्वमानः। वाजी। वहन्। वाजिनम्। जातवेद इति जातऽवेदः। देवानाम्। वक्षि। प्रियम्। आ। सधस्थमिति सधऽस्थम्॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभुभक्त का पहला लक्षण यह है कि (समिद्धः) = वह ज्ञान से दीप्त होता है। जीवन का प्रथमाश्रम 'ब्रह्मचाश्रम' है, यह आश्रम ज्ञान के भक्षण का है। २. यह प्रभुभक्त (मतीनाम्) = विचारशीलताओं के कृदरम् उदर को अञ्जन् प्रकट करता है। इसके व्यवहार में सदा विचारशीला का आभास मिलता है। यह कोई भी काम नासमझी से नहीं करता। इसके कार्यों में कुशलता होती है। ३. हे (अग्ने) = प्रगतिशील जीव ! तू (मधुमत्) = मधु से युक्त (घृतम्) = घृत को (पिन्वमानः) = अपने में सींचनेवाला बनता है, अर्थात् 'मधु व घृत' आदि पदार्थों का सेवन करता है। ४. इन उत्तम पदार्थों का सेवन करता हुआ (वाजी) = तू शक्तिशाली बनता है और (वाजिनम्) = उस सर्वशक्तिमान् प्रभु को (वहन्) = अपने हृदय में धारण करता है। ५. प्रभु को हृदय में धारण करने से (जातवेदः) = आविर्भूत ज्योतिवाला होता है, अतः तुझमें ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। ६. तू अपने को देवानाम् देवों के (प्रियम्) = प्रिय (सधस्थम्) = मिलकर बैठने के स्थान को (आवक्षि) = सर्वथा प्राप्त कराता है, अर्थात् तू सदा ऐसे सत्संगों में उपस्थित होता है, जिनमें विद्वान् लोग एकत्र होकर प्रीतिपूर्वक ज्ञानचर्चा करते हैं।
Essence
भावार्थ- प्रभुभक्त के जीवन में ज्ञान का सर्वोपरि स्थान होता है। उसे यह पता है कि ज्ञानीभक्त ही प्रभु को आत्मतुल्य प्रिय है।
Subject
ज्ञान