Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 5

46 Mantra
28/5
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- बृहदुक्थो वामदेव ऋषिः Chhand- निचृदतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒दोजो॒ न वी॒र्यꣳ सहो॒ द्वार॒ऽ इन्द्र॑मवर्द्धयन्।सु॒प्रा॒य॒णाऽ अ॒स्मिन् य॒ज्ञे वि श्र॑यन्ता॒मृता॒वृधो॒ द्वार॒ इन्द्रा॑य मी॒ढुषे॒ व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥५॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। ओजः॑। न। वी॒र्य᳖म्। सहः॑। द्वारः॑। इन्द्र॑म्। अ॒व॒र्द्ध॒य॒न्। सु॒प्रा॒य॒णाः। सु॒प्रा॒य॒ना इति॑ सुऽप्राय॒नाः। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। वि। श्र॒य॒न्ता॒म्। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। द्वारः॑। इन्द्रा॑य। मी॒ढुषे॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥५ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षदोजो न वीर्यँ सहो द्वारऽइन्द्रमवर्धयन् । सुप्रायणाऽअस्मिन्यज्ञे विश्रयन्तामृतावृधो द्वारऽइन्द्राय मीढुषे व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। ओजः। न। वीर्यम्। सहः। द्वारः। इन्द्रम्। अवर्द्धयन्। सुप्रायणाः। सुप्रायना इति सुऽप्रायनाः। अस्मिन्। यज्ञे। वि। श्रयन्ताम्। ऋतावृधः। ऋतवृध इत्यृतऽवृधः। द्वारः। इन्द्राय। मीढुषे। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला अथवा प्रभु का आह्वान करनेवाला [ आह्वाता] (ओजः) = ओज को (न) = और (वीर्यम्) = वीर्य को (सहः) = सहनशक्ति को (यक्षत्) = अपने साथ संगत करे, अर्थात् प्रभुस्मरण करते हुए तथा त्याग की वृत्ति को अपने में पनपाते हुए हम 'ओज, वीर्य व सहस्' को अपने में धारण करें। ३. ऐसा करने पर (द्वार:) = हमारे सभी इन्द्रियद्वार (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को अवर्धयन् बढ़ानेवाले होते हैं, अर्थात् सब इन्द्रियद्वारों से प्रभु-पूजन चलता है और ये विषय-प्रवणता से दूर हो जाते हैं। ३. ये इन्द्रियद्वार (सुप्रायणाः) = प्रकृष्ट गमनवाले होकर (अस्मिन् यज्ञे) = इस जीवनयज्ञ में (विश्रयन्ताम्) - विशिष्टिरूप से [ श्रि= सेवायाम्] सेवा करनेवाले हों । ४. (ऋतावृधः) = ये सदा ऋत का वर्धन करनेवाले :-नव इन्द्रियद्वार इन्द्राय उस परमैश्वर्यशाली मीढुषे सुखों का सेचन करनेवाले प्रभु की प्राप्ति के लिए आज्यस्य व्यन्तु शक्ति का पान करें, शक्ति को शरीर में सुरक्षित रक्खें । ५. हे (होतः) = दानपूर्वक अदन करनेवाले जीव ! तू (यज) = उस प्रभु को अपने साथ संगत कर, खूब देनेवाला बन।
Essence
भावार्थ- हम अपने में ओजस्विता को धारण करें। हमारे इन्द्रियद्वार उस प्रभु का वर्धन करनेवाले हों। इनसे सत्य का ही पोषण हो और शक्ति का रक्षण करते हुए हम प्रभु को प्राप्त करें।
Subject
ओजस्, वीर्य व सहस्