Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 42

46 Mantra
28/42
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- सरस्वत्यृषिः Chhand- निचृदतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वो नरा॒शꣳसो॑ दे॒वमिन्द्रं॑ वयो॒धसं॑ दे॒वो दे॒वम॑वर्द्धयत्।वि॒राजा॒ छन्द॑सेन्द्रि॒यꣳ रू॒पमिन्द्रे॒ वयो॒ दध॑द् वसु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य वेतु॒ यज॑॥४२॥

दे॒वः। नरा॒शꣳसः॑। दे॒वम्। इन्द्र॑म्। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒ऽधस॑म्। दे॒वः। दे॒वम्। अ॒व॒र्ध॒य॒त्। वि॒राजेति॑ वि॒ऽराजा॑। छन्द॑सा। इ॒न्द्रि॒यम्। रू॒पम्। इन्द्रे॑। वयः॑। दध॑त्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। वे॒तु॒। यज॑ ॥४२ ॥

Mantra without Swara
देवो नराशँसो देवमिन्द्रँवयोधसन्देवो देवमवर्धयत् । विराजा च्छन्दसेन्द्रियँ रुपमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज ॥

देवः। नराशꣳसः। देवम्। इन्द्रम्। वयोधसमिति वयःऽधसम्। देवः। देवम्। अवर्धयत्। विराजेति विऽराजा। छन्दसा। इन्द्रियम्। रूपम्। इन्द्रे। वयः। दधत्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। वेतु। यज॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (देवः) = अपने ज्ञान से दीप्त तथा अग्नि आदि ऋषियों के हृदयों को ज्ञान से द्योतित करनेवाला (नराशंसः) = सब मनुष्यों से शंसनीय (देवः) = सब-कुछ देनेवाला वह प्रभु, (देवम्) = अपने को ज्ञानादि दिव्य गुणों से युक्त करनेवाले (वयोधसम्) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करनेवाले (देवम्) = दानादि गणुयुक्त (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्द्धयत्) = बढ़ाता है। (विराजा छन्दसा) = 'अपने जीवन को विशिष्ट रूप से दीप्त बनाऊँगा अथवा निश्चित रूप से व्यवस्थित [Regulated] करूँगा', इस भावना के द्वारा (इन्द्रियम्) = प्रत्येक इन्द्रिय के सामर्थ्य को (रूपम्) = सौन्दर्य को तथा (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (दधत्) = धारण करता हुआ प्रभु ऐसी कृपा करे कि (वसुवने) = धन के सेवन में भी (वसुधेयस्य) = धन के आधारभूत प्रभु का वेतु यह जितेन्द्रिय पुरुष पान करे, प्रजनन करे, अपने हृदय में आविर्भाव करें। ३. हे जीव ! तू (यज) = यज्ञशील बन और उस प्रभु से अपना मेल कर ।
Essence
भावार्थ- हम अपने जीवन को दीप्त व व्यवस्थित बनाएँ, जिससे इस संसार में विचरते हुए भी इसमें उलझ न जाएँ और प्रभु को विस्मृत न करें।
Subject
विराट् छन्द