Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 37

46 Mantra
28/37
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- सरस्वत्यृषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वीऽउ॒षासा॒नक्ता॑ दे॒वमिन्द्रं॑ वयो॒धसं॑ दे॒वी दे॒वम॑वर्धताम्।अ॒नु॒ष्टुभा॒ छन्द॑सेन्द्रि॒यं बल॒मिन्द्रे॒ वयो॒ दध॑द् वसु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य वीतां॒ यज॑॥३७॥

दे॒वीऽइति॑ दे॒वी। उ॒षासा॒नक्ता॑। उ॒षसा॒नक्तेत्यु॒षसा॒नक्ता॑। दे॒वम्। इन्द्र॑म्। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒ऽधस॑म्। दे॒वी। दे॒वम्। अ॒व॒र्ध॒ता॒म्। अ॒नु॒ष्टुभा॑। अ॒नु॒स्तुभेत्य॑नु॒ऽस्तुभा॑। छन्द॑सा। इ॒न्द्रि॒यम्। बल॑म्। इन्द्रे॑। वयः॑। दध॑त्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। वी॒ता॒म्। यज॑ ॥३७ ॥

Mantra without Swara
देवीऽउषासानक्ता देवमिन्द्रँवयोधसन्देवी देवमवर्धताम् । अनुष्टुभा च्छन्दसेन्द्रियम्बलमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वीताँयज ॥

देवीऽइति देवी। उषासानक्ता। उषसानक्तेत्युषसानक्ता। देवम्। इन्द्रम्। वयोधसमिति वयःऽधसम्। देवी। देवम्। अवर्धताम्। अनुष्टुभा। अनुस्तुभेत्यनुऽस्तुभा। छन्दसा। इन्द्रियम्। बलम्। इन्द्रे। वयः। दधत्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। वीताम्। यज॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (उषासानक्ता) = उषा और रात (देवी) = हमारे सब व्यवहारों के साधक हैं, ये (देवी) = देदीप्यमान होते हुए (देवम्) = दिव्य गुणों को अपनानेवाले (वयोधसम्) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करनेवाले (देवम्) = ज्ञान से देदीप्यमान (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्द्धताम्) = बढ़ाते हैं। २. (अनुष्टुभा छन्दसा) = प्रत्येक कार्य में उस-उस सफलता के लाभ के साथ प्रभु-स्तवन [अनु-स्तु] की प्रबल कामना से (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों के सामर्थ्य को (बलम्) = बल को तथा (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (दधत्) = [दधत्यौ-म०] धारण करते हुए ये दिन-रात (वसुवने) = धन के सेवन में (वसुधेयस्य) = धन के आधारभूत परमात्मा का (वीताम्) = प्रजनन करें, प्रभु-भावना को जागरित व विकसित करें। हे (होत:) = दानपूर्वक अदन करनेवाले! तू (यज) = दानशील बनकर उस प्रभु से अपना मेल बना।
Essence
भावार्थ- 'दिन-रात को ज्ञान-प्राप्ति द्वारा दीप्त बनाना और प्रत्येक कर्म में सफलता के साथ प्रभु का स्मरण करना, जिससे उस सफलता का गर्व न हो जाए' यह प्रभु-प्राप्ति का तीसरा साधन है।
Subject
अनुष्टुप् छन्द