Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 35

46 Mantra
28/35
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- सरस्वत्यृषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वं ब॒र्हिर्व॑यो॒धसं॑ दे॒वमिन्द्र॑मवर्धयत्।गा॒य॒त्र्या छन्द॑सेन्द्रि॒यं चक्षु॒रिन्द्रे वयो॒ दध॑द् वसु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य वेतु॒ यज॑॥३५॥

दे॒वम्। ब॒र्हिः। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒ऽधस॑म्। दे॒वम्। इन्द्र॑म्। अ॒व॒र्ध॒य॒त्। गा॒य॒त्र्या। छन्द॑सा। इ॒न्द्रि॒यम्। चक्षुः॑। इन्द्रे॑। वयः॑। दध॑त्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। वेतु॑। यज॑ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
देवम्बर्हिर्वयोधसन्देवमिन्द्रमवर्धयत् । गायत्र्या छन्दसेन्द्रियञ्चक्षुरिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज ॥

देवम्। बर्हिः। वयोधसमिति वयःऽधसम्। देवम्। इन्द्रम्। अवर्धयत्। गायत्र्या। छन्दसा। इन्द्रियम्। चक्षुः। इन्द्रे। वयः। दधत्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। वेतु। यज॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (देवम् बर्हिः) = दिव्य गुणों को धारण करनेवाला वासनाशून्य हृदय (वयोधसम्) = उत्कृष्ट आयुष्य को धारण करनेवाला है। हृदय के अच्छा होने पर जीवन भी अच्छा होता है। २. यह (हृदय देवम्) = ज्ञान की ज्योति से जगमगानेवाले (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्द्धयत्) = बढ़ाता है। हृदय की पवित्रता ही सब प्रकार की वृद्धि का मूल है। ३. (गायत्र्या छन्दसा) = प्राणशक्ति की रक्षा की प्रबल इच्छा के द्वारा (इन्द्रियम्) = वीर्य व इन्द्रियों के सामर्थ्य को, (चक्षुः) = दृष्टिशक्ति को तथा (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (दधत्) = स्थापित करता हुआ, यह पवित्र हृदय (वसुवने) = धन के सेवन में (वसुधेयस्य) = धन के आधारभूत प्रभु को वेतु प्रजनन करे 'प्रभु- भावना' को अपने में विकसित करे। ४. हे (होत:) = दानशील पुरुष ! तू (यज) = इस पवित्र हृदय के द्वारा उस प्रभु का अपने-आप संगम कर, प्रभु की पूजा करनेवाला बन उसके प्रति अपना अर्पण कर दे।
Essence
भावार्थ - दिव्य हृदय प्रभु-प्राप्ति का प्रथम साधन है। प्रभु प्राप्ति के लिए साधना का प्रारम्भ वहीं से होता है कि हम हृदय को वासनाशून्य बनाएँ।
Subject
गायत्री छन्द