Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 25

46 Mantra
28/25
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- सरस्वत्यृषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒त्तनू॒नपा॑तमु॒द्भिदं॒ यं गर्भ॒मदि॑तिर्द॒धे शुचि॒मिन्द्रं॑ वयो॒धस॑म्।उ॒ष्णिहं॒ छन्द॑ऽ इन्द्रि॒यं दि॑त्य॒वाहं॒ गां वयो॒ दध॒द्वेत्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥२५॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। तनू॒नपा॑त॒मिति॒ तनू॒ऽनपा॑तम्। उ॒द्भिद॒मित्यु॒त्ऽभिद॑म्। यम्। गर्भ॑म्। अदि॑तिः। द॒धे। शुचि॑म्। इन्द्र॑म्। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒धस॑म्। उ॒ष्णिह॑म्। छन्दः॑। इ॒न्द्रि॒यम्। दि॒त्य॒वाह॒मिति॑ दित्य॒ऽवाह॑म्। गाम्। वयः॑। दध॑त्। वेतु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षत्तनूनपातमुद्भिदँयङ्गर्भमदितिर्दधे शुचिमिन्द्रँवयोधसम् । उष्णिहञ्छन्दऽइन्द्रियन्दित्यवाहङ्गाँवयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। तनूनपातमिति तनूऽनपातम्। उद्भिदमित्युत्ऽभिदम्। यम्। गर्भम्। अदितिः। दधे। शुचिम्। इन्द्रम्। वयोधसमिति वयःधसम्। उष्णिहम्। छन्दः। इन्द्रियम्। दित्यवाहमिति दित्यऽवाहम्। गाम्। वयः। दधत्। वेतु। आज्यस्य। होतः। यज॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (यक्षत्) = अपने साथ संगत करता है, उस प्रभु को, जो - [क] (तनूनपातम्) = हमारे शरीर व शक्तियों के विकास को न गिरने देनेवाले हैं, प्रभु स्मरण से शरीर स्वस्थ बना रहता है, [ख] (उद्भिदम्) = वे प्रभु सब विघ्नों को विदीर्ण करके हमारा उत्थान करनेवाले हैं, [ग] ये प्रभु वे हैं (यम्) = जिनको (अदितिः) = न खण्डित होनेवाला, अपने शरीर व मन को रोगों व वासनाओं से आक्रान्त न होने देनेवाला (गर्भं दधे) = अपने में गर्भरूप से धारण करता है, अर्थात् प्रभु का निवास अदिति में होता है, उस पुरुष में जोकि रोगों व वासनाओं से खण्डित न हो, [घ] (शुचिम्) = वे प्रभु पूर्ण पवित्र हैं, हमें पवित्र बनानेवाले हैं, [ङ] (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली हैं, [च] (वयोधसम्) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करानेवाले हैं । २. यह होता [क] (उष्णिहं छन्दः) = [उत् स्निह्यति] उत्कृष्ट स्नेह की प्रबल कामना को, [ख] (इन्द्रियम्) = प्रत्येक इन्द्रिय के सामर्थ्य को, [ग] (दित्यवाहं गाम्) = वासनाओं का खण्डन करनेवाली वेदवाणी को, [घ] (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (दधत्) = धारण करने के हेतु से (आज्यस्य वेतु) = शक्ति का पान करे, वीर्य को अपने अन्दर ही सुरक्षित करे। ३. हे (होत:) = दानपूर्वक अदन करनेवाले तू (यज) = यज्ञशील बन और उस प्रभु से अपना मेल बना ।
Essence
भावार्थ- हम होता बनकर सब उन्नतियों के साधक प्रभु को धारण करें। हमारा स्नेह प्रकृति से न होकर प्रभु से हो। हम वासनाओं का खण्डन करनेवाले वेदज्ञान को अपनाएँ।
Subject
दित्यवाट् गौः