Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 23

46 Mantra
28/23
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अश्विनावृषी Chhand- कृतिः Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्निम॒द्य होता॑रमवृणीता॒यं यज॑मानः॒ पच॒न् पक्तीः॒ पच॑न् पुरो॒डाशं॑ ब॒ध्नन्निन्द्रा॑य॒ च्छाग॑म्। सू॒प॒स्थाऽ अ॒द्य दे॒वो वन॒स्पति॑रभव॒दिन्द्रा॑य॒ च्छागे॑न।अद्य॒त्तं मे॑द॒स्तः प्रति॑ पच॒ताग्र॑भी॒दवी॑वृधत् पुरो॒डाशे॑न त्वाम॒द्य ऋ॑षे॥२३॥

अ॒ग्निम्। अ॒द्य। होता॑रम्। अ॒वृ॒णी॒त॒। अ॒यम्। यज॑मानः। पच॑न्। पक्तीः॑। पच॑न्। पु॒रोडाश॑म्। ब॒ध्नन्। इन्द्रा॑य। छाग॑म्। सू॒प॒स्था इति॑ सुऽउप॒स्थाः। अ॒द्य। दे॒वः। वन॒स्पतिः॑। अ॒भ॒व॒त्। इन्द्रा॑य। छागे॑न। अद्य॑त्। तम्। मे॒द॒स्तः। प्रति॑। प॒च॒ता। अग्र॑भीत्। अवी॑वृधत्। पु॒रो॒डाशे॑न। त्वाम्। अ॒द्य। ऋ॒षे॒ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
अग्निमद्य होतारमवृणीतायँयजमानः पचन्पक्तीः पचन्पुरोडाशम्बध्नन्निन्द्राय च्छागम् । सूपस्थाऽअद्य देवो वनस्पतिरभवदिन्द्राय च्छागेन । अघत्तम्मेदस्तः प्रति पचताग्रभीदवीवृधत्पुरोडाशेन । त्वामद्यऽऋषे॥ गलितमन्त्रः त्वामद्यऽऋषऽआर्षेयऽऋषीणान्नपादवृणीतायँयजमानो बहुभ्यऽआ सङ्गतेभ्यऽएष मे देवेषु वसु वार्यायक्ष्यत इति ता या देवा देव दानान्यदुस्तान्यस्माऽआ च शास्स्वा च गुरस्वेषितश्च होतरसि भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय सूक्ता ब्रूहि ॥

अग्निम्। अद्य। होतारम्। अवृणीत। अयम्। यजमानः। पचन्। पक्तीः। पचन्। पुरोडाशम्। बध्नन्। इन्द्राय। छागम्। सूपस्था इति सुऽउपस्थाः। अद्य। देवः। वनस्पतिः। अभवत्। इन्द्राय। छागेन। अद्यत्। तम्। मेदस्तः। प्रति। पचता। अग्रभीत्। अवीवृधत्। पुरोडाशेन। त्वाम्। अद्य। ऋषे॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अयम्) = इस (यजमानः) = यज्ञ के स्वभाववाले व्यक्ति ने (अद्य) = आज (होतारम्) = इस सृष्टि के सर्वोत्तम पदार्थों को देनेवाले (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु का अवृणीत वरण किया है। यह (पंक्तिः पचन्) = पक्तव्य पदार्थों का परिपाक कर रहा है। इसने शरीर को दृढ़ बनाया है और मस्तिष्क को ज्ञान से परिपक्व किया है। (पुरोडाशम् पचन्) = [ आत्मा वै यजमानस्य पुरोडाश: । - कौ० १३.५ ] इसने अपनी आत्मा का भी ठीक परिपाक किया है। आध्यात्मिकता का पोषण ही आत्मा का परिपाक है। (इन्द्राय) = इन्द्रशक्ति के विकास के लिए (छागम् बध्नन्) = वासनाओं के छेदन-भेदन का प्रबन्ध किया है। वासनाओं के छेदन से ही आत्मशक्ति का विकास होता है। ३. छागेन इस वासनाओं के छेदन-भेदन में (इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (अद्यः) = आज वासना विनाश हो जाने पर (देवः) = वह ज्योतिर्मय (वनस्पतिः) = ज्ञान की रश्मियों का पति प्रभु (सूपस्था) = सुगमता से उपस्थान के योग्य (अभवत्) = हो गया है। वासनाओं ने ही वस्तुत: ज्ञान पर वह परदा डाला हुआ था, जिससे हमें उस प्रभु की ज्योति का दर्शन नहीं हो रहा था । ४. आज वासना-विनाश द्वारा प्रभुदर्शन होने पर यह (भक्त तम्) = उस प्रभु को (मेदस्तः) = बड़े स्नेह से (अघत्) = खाता है, अर्थात् अपने अन्दर ग्रहण करता है। वस्तुतः यह प्रभु का, ब्रह्म का भक्षण ही 'ब्रह्मचर्य' है, ब्रह्म का चरना। ५. (प्रतिपचता) = इसी उद्देश्य से इसने एक-एक शक्ति का ठीक से परिपाक किया है। (अग्रभीत्) = उन शक्तियों का इसने ग्रहण किया है और (पुरोडाशेन) = आत्मभाव से (अवीवृधत्) = बढ़ा है।
Essence
भावार्थ - यज्ञशील पुरुष प्रभु का ही वरण करता है। वासना - विनाश से वह प्रभु सुगमता से उपस्थान के योग्य होता है। वह अपनी शक्तियों का ठीक से परिपाक करता है।
Subject
छाग बन्धन