Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 18

46 Mantra
28/18
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अश्विनावृषी Chhand- अतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वीस्ति॒स्रस्ति॒स्रो दे॒वीः पति॒मिन्द्र॑मवर्धयन्। अस्पृ॑क्ष॒द् भाार॑ती॒ दिव॑ꣳ रु॒द्रैर्य॒ज्ञꣳ सर॑स्व॒तीडा॒ वसु॑मती गृ॒हान् व॑सु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य व्यन्तु॒ यज॑॥१८॥

दे॒वीः। ति॒स्रः। ति॒स्रः। दे॒वीः। पति॑म्। इन्द्र॑म्। अ॒व॒र्ध॒य॒न्। अस्पृ॑क्षत्। भार॑ती। दिव॑म्। रु॒द्रैः। य॒ज्ञम्। सर॑स्वती। इडा॑। वसु॑म॒तीति॒ वसु॑ऽमती। गृ॒हान्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। व्य॒न्तु॒। यज॑ ॥१८ ॥

Mantra without Swara
देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीः पतिमिन्द्रमवर्धयन् । अस्पृक्षद्भारती दिवँ रुद्रैर्यज्ञँ सरस्वतीडा वसुमती गृहान्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥

देवीः। तिस्रः। तिस्रः। देवीः। पतिम्। इन्द्रम्। अवर्धयन्। अस्पृक्षत्। भारती। दिवम्। रुद्रैः। यज्ञम्। सरस्वती। इडा। वसुमतीति वसुऽमती। गृहान्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। व्यन्तु। यज॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (तिस्रः देवी:) = भारती, सरस्वती व (इडा) = नामक तीन देवियाँ, जो (तिस्रः) = तीनों की तीनों (देवी:) = द्युति - ज्ञानदीप्ति व दानवृत्ति को हमें प्राप्त करानेवाली हैं, ये देवियाँ (पतिम् इन्द्रम्) = काम-क्रोधादि को वश में करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्धयन्) = बढ़ाती हैं । २. इस रक्षक जीव को (दिवम्) = मस्तिष्करूप द्युलोक में (भारती) = [ भरत आदित्य:, तस्य भा भारती] हमारा धारण करनेवाली ये सूर्य की किरणें (अस्पृक्षत्) = छूती हैं ३. (रुद्रैः) = [रोरुयमाणो द्रवति - नि०] उस प्रभु के नामोच्चारण के साथ क्रिया में लगे रहने के साथ (सरस्वती) = शिक्षा की अधिदेवता यज्ञम् आत्मा के इन्द्रियों के साथ संगतिकरण करानेवाले मन को [हृदयान्तरिक्ष को] छूती है तथा ४. यह (वसुमती) = सब वसुओं को देनेवाली (इडा) = श्रद्धा (गृहान्) = हमारे इन शरीररूपी घरों को छूती है, अर्थात् इन तीन देवियों के अनुग्रह से हमारा मस्तिष्क, मन व गृहरूप शरीर सब सुन्दर बन जाते हैं । ५. ये तीनों देवियाँ (वसुवने) = धन के सेवन में (वसुधेयस्य) = उस धन के आधारभूत प्रभु को (व्यन्तु) = विकसित करें, उसकी भावना को अपने में जागरित करें, अर्थात् प्रभु को भूलें नहीं। (यज) = हे जीव ! तू इन देवियों को अपने साथ संगत कर अथवा प्रभु के साथ अपना मेल बना और उसके लिए दानशील बन।
Essence
भावार्थ- हम 'भारती, सरस्वती व इडा' इन देवियों के पति बनें। इनसे हमारे मस्तिष्क, मन व शरीररूप गृह सुभूषित हों।
Subject
तीन देवताएँ