Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 15

46 Mantra
28/15
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अश्विनावृषी Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वी जोष्ट्री॒ वसु॑धिती दे॒वमिन्द्र॑मवर्धताम्। अया॑व्य॒न्याघा द्वेषा॒स्यान्या व॑क्ष॒द्वसु॒ वार्या॑णि॒ यज॑मानाय शिक्षि॒ते व॑सु॒वने॑ व॑सु॒धेय॑स्य वीतां॒ यज॑॥१५॥

दे॒वी इति॑ दे॒वी। जोष्ट्री॒ इति॒ जोष्ट्री॑। वसु॑धिती॒ इति॒ वसु॑ऽधिती। दे॒वम्। इन्द्र॑म्। अ॒व॒र्ध॒ता॒म्। अया॑वि। अ॒न्या। अ॒घा। द्वेषा॑सि। आ। अ॒न्या। व॒क्ष॒त्। वसु॑। वार्या॑णि। यज॑मानाय। शि॒क्षि॒त इति॑ शिक्षि॒ते। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। वी॒ता॒म्। यज॑ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
देवी जोष्ट्री वसुधिती देवमिन्द्रमवर्धताम् । अयाव्यन्याघा द्वेषाँस्यान्या वक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य वीताँयज ॥

देवी इति देवी। जोष्ट्री इति जोष्ट्री। वसुधिती इति वसुऽधिती। देवम्। इन्द्रम्। अवर्धताम्। अयावि। अन्या। अघा। द्वेषासि। आ। अन्या। वक्षत्। वसु। वार्याणि। यजमानाय। शिक्षित इति शिक्षिते। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। वीताम्। यज॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यहाँ 'जोष्ट्री' शब्द अहोरात्र के लिए आया है। ये अहोरात्र परस्पर एक-दूसरे का प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाले हैं, एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, दोनों के लिए 'दिन व रात' अलग-अलग शब्दों का प्रयोग भी होता है- रात्रिन्दिवं, नक्तन्दिवं, अहोरात्र' आदि शब्दों में द्वन्द्वात्मक प्रयोग तो इनका है ही। ये दोनों (देवी) = दिव्य गुणोंवाले हैं, इस दिव्यता का उल्लेख प्रस्तुत मन्त्र में ही आगे है। ये (वसुधिती) = सब निवासक तत्त्वों का धारण करनेवाले हैं। ये (देवम्) = देव वृत्तिवाले (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्धताम्) = बढ़ाते हैं, उसकी उन्नति का कारण बनते हैं। आसुर वृत्तिवाले तो इन दिन- रोतों में भोगमय जीवन बिताते हुए अपना ह्रास कर बैठते हैं । २. इनमें से (अन्या) = एक 'रात्रि' (अघा) = पापों को व (द्वेषांसि) = द्वेषों को (अयावि) = हमसे पृथक् करती है। रात्रि में सो जाने पर पाप व द्वेष विस्मृत हो जाते हैं। महानिद्रा व मृत्यु की व्यवस्था भी इन राग-द्वेषों को भुलाने के लिए ही हुई है। हम महानिद्रा में जाकर इन द्वेषों व पापवृत्तियों को बिल्कुल भूल जाते हैं। ३. (अन्या) = दूसरा यह 'दिन' (वार्याणि वसु) = [ वसूनि ] वरणीय धनों को (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए, उत्तम कर्मों में लगे हुए पुरुष के लिए आवक्षत् प्राप्त कराता है। दिन में हम सुपथ से, उत्तम मार्ग से धन कमानेवाले होते हैं । ४. इस प्रकार शिक्षिते -द्वेष व पाप के अपनयन [दूर करने में] में तथा वरणीय वसुओं के प्रापण में सधे हुए [trained ] ये दिन-रात वसुवने धन के सेवन में (वसुधेयस्य) = धन के आधारभूत परमात्मा को (वीताम्) = प्रकाशित करें, आविर्भूत करें, अर्थात् हम प्रभु को भूलें नहीं । ५. हे जीव! तू (यज) = इस प्रकार प्रभु से अपना मेल बना, यज्ञशील बन, दान दे।
Essence
भावार्थ - रात्रि हमें सब द्वेषों व पापों को भुला देती है। दिन हमें वरणीय धनों के प्रापण में सहायक होता है। ये हमें धन प्राप्त कराते हुए प्रभु का भी स्मरण कराएँ ।
Subject
देवी जोष्ट्री [अहोरात्रे ]