Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 13

46 Mantra
28/13
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अश्विनावृषी Chhand- भुरिक् शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वीर्द्वार॒ऽ इन्द्र॑ꣳसङ्घा॒ते वी॒ड्वीर्याम॑न्नवर्द्धयन्। आ व॒त्सेन॒ तरु॑णेन कुमा॒रेण॑ च मीव॒तापार्वा॑णꣳ रे॒णुक॑काटं नुदन्तां वसु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य व्यन्तु॒ यज॑॥१३॥

दे॒वीः। द्वारः॑। इन्द्र॑म्। स॒ङ्घा॒त इति॑ सम्ऽघा॒ते। वी॒ड्वीः। याम॑न्। अ॒व॒र्द्ध॒य॒न्। आ। व॒त्सेन॑। तरु॑णेन। कु॒मा॒रेण॑। च॒। मी॒व॒ता। अप॑। अर्वा॑णम्। रे॒णुक॑काट॒मिति॑ रे॒णुऽक॑काटम्। नु॒द॒न्ता॒म्। वसु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। व्य॒न्तु॒। यज॑ ॥१३ ॥

Mantra without Swara
देवीर्द्वारऽइन्द्रँ सङ्घाते वीड्वीर्यामन्नवर्धयन् । आ वत्सेन तरुणेन कुमारेण च मीवतापार्वाणँ रेणुककाटन्नुदन्ताँवसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥

देवीः। द्वारः। इन्द्रम्। सङ्घात इति सम्ऽघाते। वीड्वीः। यामन्। अवर्द्धयन्। आ। वत्सेन। तरुणेन। कुमारेण। च। मीवता। अप। अर्वाणम्। रेणुककाटमिति रेणुऽककाटम्। नुदन्ताम्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। व्यन्तु। यज॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (देवी:) = दिव्य गुणोंवाले, जीवन-यात्रा में सारे व्यवहारों के साधक [दिव् व्यवहार] (द्वार:) = इन्द्रियद्वार, जो अलग-अलग भी बड़े प्रबल हैं, परन्तु (संघाते) = एक समूह के रूप में हो जाने पर तो (वीड्वी:) = अत्यन्त प्रबल हैं, हमें कुचल डालनेवाले हैं। ये इन्द्रियद्वार (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (यामन्) = जीवन-यात्रा में (अवर्धयन्) = बढ़ानेवाले होते हैं। 'अजितेन्द्रिय पुरुष' इन इन्द्रियों से कुचला जाता है तो जितेन्द्रिय को ये इन्द्रियाँ सिद्धि प्राप्त करानेवाली होती हैं । २. ये इन्द्रियाँ (वत्सेन) = [ वदति इति] प्रभु के नाम का उच्चारण करनेवाले, (तरुणेन) = वासनाओं व विघ्नों को तैर जानेवाले, (कुमारेण) = [ कु मार ] सब कुत्सित वृत्तियों को नष्ट कर डालनेवाले अथवा [कुमार क्रीडायाम्] = एक क्रीडक की मनोवृत्तिवाले मीवता शत्रुओं की हिंसा करनेवाले [मी हिंसायाम्] इस इन्द्र के साथ ये इन्द्रियाँ (अर्वाणम्) = [अव् to kill ] नष्ट कर डालनेवाले अथवा 'अर्यते यत्र' जिसकी ओर अज्ञानवश जाया जाता है, उस (रेणुककाटम्) = धूलि से आच्छादित विषयकूप को (अपनुदन्ताम्) = अपने से दूर कर दें, अर्थात् संसार के ये विषय उस कुएँ के समान हैं जोकि ऊपर धूलि से आच्छन्न होने के कारण सामान्य भूमि के रूप में दिखता है और आकर्षक होने के कारण इन्द्रियों की उधर आने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और उधर जाने पर हम इस कुएँ में गिरते हैं और समाप्त हो जाते हैं। चाहिए यह कि हम इस कुएँ से बचें- हमारे इन्द्रियद्वार इस ओर न जाएँ। यह होगा तभी जबकि इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव सदा प्रभु-नाम का उच्चारण करे [वत्स], वासनाओं को तैरने के लिए यत्नशील हो [तरुण], संसार में एक क्रीडक की मनोवृत्ति को अपने में विकसित करे [कुमार] तथा सदा बुराइयों के संहार में लगा रहे [मीवता ] ३. विषयवासनारूप कूप को दूर से ही छोड़नेवाले ये इन्द्रियद्वार (वसुवने) = धन के सेवन में (वसुधेयस्य) = धन के आधारभूत प्रभु का (व्यन्तु) = विकास करें, अर्थात् प्रभु का खूब ही स्मरण करें। ४. इस प्रकार हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (यज) = यज्ञशील बन, उस प्रभु से मेल करनेवाला बन, इसीलिए तू धन का दान कर। दान ही यज्ञ का उत्कृष्ट रूप है।
Essence
भावार्थ- इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल हैं, विषय-वासनाओं के तृणाच्छन्न कूप के समान हैं। हम प्रभु नामस्मरण करते हुए इन्द्रियों को इस कुएँ में गिरने से बचाएँ । धन कमाएँ, परन्तु प्रभु को न भूलें और धन का दान करनेवाले हों।
Subject
देवी: द्वार:- दिव्य इन्द्रियद्वार