Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 9

44 Mantra
27/9
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒मु॒त्र॒भूया॒दध॒ यद्य॒मस्य॒ बृह॑स्पतेऽ अ॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चः।प्रत्यौ॑हताम॒श्विना॑ मृ॒त्युम॑स्माद् दे॒वाना॑मग्ने भि॒षजा॒ शची॑भिः॥९॥

अ॒मु॒त्र॒भूया॒दित्य॑मुत्र॒ऽभूया॑त्। अध॑। यत्। य॒मस्य॑। बृह॑स्पते। अ॒भिश॑स्ते॒रित्य॒भिऽश॑स्तेः। अमु॑ञ्चः। प्रति॑। औ॒ह॒ता॒म्। अ॒श्विना॑। मृ॒त्युम्। अ॒स्मा॒त्। दे॒वाना॑म्। अ॒ग्ने॒। भि॒षजा॑। शची॑भिः ॥९ ॥

Mantra without Swara
अमुत्रभूयादध यद्यमस्य बृहस्पतेऽअभिसस्तेरमुञ्चः । प्रत्औहतामश्विना मृत्युमस्माद्देवानामग्ने भिषजा शचीभिः ॥

अमुत्रभूयादित्यमुत्रऽभूयात्। अध। यत्। यमस्य। बृहस्पते। अभिशस्तेरित्यभिऽशस्तेः। अमुञ्चः। प्रति। आैहताम्। अश्विना। मृत्युम्। अस्मात्। देवानाम्। अग्ने। भिषजा। शचीभिः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (बृहस्पतेः) = ज्ञान के स्वामी आचार्य ! आप अपने उपनीत इस शिष्य को (अमुत्रभूयात्) = सदा परलोक में होने से (अमुञ्च:) = छुड़ाइए, अर्थात् यह प्रतिक्षण परलोक का ही ध्यान न करता रहे, यह इस लोक का भी ध्यान करे। २. (अध) = और (यत्) = जो (यमस्य) = यम का, मृत्यु की देवता का भय है उससे भी, आप इसे छुड़ाइए। यह मौत से ही न डरता रहे । ३. हे आचार्य ! इसे आप [क] (अभिशस्ते:) = लोकापवाद से मुक्त कीजिए, [ख] साथ ही 'अभिशस्ते: अमुञ्चा:' का यह भी अर्थ है कि इसे लोकापवाद प्राप्त न हो। ४. (अश्विना) = प्रणापान जो (देवानाम् भिषजा) = देवों के वैद्य हैं, देवलोग दवाइयों पर आश्रय न करके प्राणापान की शक्ति का ही आश्रय करते हैं, वे प्राणापान (शचीभिः) = अपनी शक्तियों के द्वारा हे (अग्ने) = विद्यार्थी की उन्नति के साधक आचार्य ! (अस्मात्) = इससे (मृत्युम्) = मृत्यु को प्रत्यौहताम् दूर करें। [प्रति प्रेरयताम् अन्यत्र नयताम् - उ० ] ।
Essence
भावार्थ- हम सदा परलोक का ही ध्यान न करते रह जाएँ, यमजनित मृत्यु से न डरते रहें, लोकापवाद के भय से मुक्त हों। प्राणापान ही हमारे वैद्य हों।
Subject
भय से मुक्ति