Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 8

44 Mantra
27/8
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृह॑स्पते सवितर्बो॒धयै॑न॒ꣳसꣳशि॑तं चित्सन्त॒रा सꣳशि॑शाधि।व॒र्धयै॑नं मह॒ते सौभ॑गाय॒ विश्व॑ऽएन॒मनु॑ मदन्तु दे॒वाः॥८॥

बृह॑स्पते। स॒वि॒तः॒। बो॒धय॑। ए॒न॒म्। सꣳशि॑त॒मिति॒ सम्ऽशि॑तम्। चि॒त्। स॒न्त॒रामिति॑ समऽत॒राम्। सम्। शि॒शा॒धि॒। व॒र्धय॑। ए॒न॒म्। म॒ह॒ते। सौभ॑गाय। विश्वे॑। ए॒न॒म्। अनु॑। म॒द॒न्तु॒। दे॒वाः ॥८ ॥

Mantra without Swara
बृहस्पते सवितर्बाधयैनँ सँशितञ्चित्सन्तराँ सँशिशाधि । वर्धयैनम्महते सौभगाय विश्वऽएनमनु मदन्तु देवाः ॥

बृहस्पते। सवितः। बोधय। एनम्। सꣳशितमिति सम्ऽशितम्। चित्। सन्तरामिति समऽतराम्। सम्। शिशाधि। वर्धय। एनम्। महते। सौभगाय। विश्वे। एनम्। अनु। मदन्तु। देवाः॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'अग्नि' गतमन्त्रों में वर्णित जीवन को बनाने के लिए आचार्य से कहते हैं कि हे (बृहस्पते) = ब्रह्मणस्पते, ज्ञान के स्वामिन्! (सवितः) = ज्ञान के बीज को विद्यार्थी के मस्तिष्क में बोनेवाले आचार्य! (एनम्) = इस तेरे समीप प्राप्त हुए हुए विद्यार्थी को (बोधय) = तू उद्बुद्ध ज्ञानवाला कर, इसे ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञान देनेवाला तू हो। २. (संशितम् चित्) = माता-पिता के द्वारा शिक्षित किये हुए को भी (सन्तराम्) = अब खूब ही (संशिशाधि) = सम्यक्तया शिक्षित कर । इसक जीवन को संयत Disciplined बनाने का ध्यान कर। ३. (एनम्) = इसको (महते सौभगाय) = महान् सौभाग्य व ऐश्वर्य के लिए (वर्धय) = बढ़ाइए। इसे इस प्रकार शिक्षित कीजिए कि यह संसार में आकर महनीय, पूजनीय, अर्थात् उत्तम मार्गों से कमाये गये ऐश्वर्य को अर्जित करनेवाला हो। ४. इसके जीवन को ऐसा बनाइए कि समावृत्त होने पर (देवा:) = सब विद्वान् (एनम् अनु) = इसका लक्ष्य करके (मदन्तु) = हर्ष को प्राप्त हों। इस ज्ञानपूर्ण, व्रती व अर्जनक्षम जीवन को देखकर सभी को प्रसन्नता हो ।
Essence
भावार्थ- आचार्य ने विद्यार्थी के जीवन में ज्ञान [Knowledge] शिक्षा [Educa tion] व अर्जनक्षमता [सौभाग्य] को पैदा करना है।
Subject
आचार्य का कर्तव्य