Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 44

44 Mantra
27/44
Devata- वायुर्देवता Rishi- शंयुर्ऋषिः Chhand- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ऊ॒र्जो नपा॑त॒ꣳस हि॒नायम॑स्म॒युर्दाशे॑म ह॒व्यदा॑तये।भुव॒द्वाजे॑ष्ववि॒ता भुव॑द् वृ॒धऽउ॒त त्रा॒ता त॒नूना॑म्॥४४॥

ऊ॒र्जः। नपा॑तम्। सः। हि॒न। अ॒यम्। अ॒स्म॒युरित्य॑स्म॒ऽयुः। दाशे॑म। ह॒व्यदा॑तय॒ इति॑ ह॒व्यऽदा॑तये। भुव॑त्। वाजे॑षु। अ॒वि॒ता। भुव॑त्। वृ॒धे। उ॒त। त्रा॒ता। त॒नूना॑म् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
ऊर्जा नपातँ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये । भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम् ॥

ऊर्जः। नपातम्। सः। हिन। अयम्। अस्मयुरित्यस्मऽयुः। दाशेम। हव्यदातय इति हव्यऽदातये। भुवत्। वाजेषु। अविता। भुवत्। वृधे। उत। त्राता। तनूनाम्॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में प्रभु को 'ऊर्जाम्पते' इस प्रकार सम्बोधन किया था । प्रस्तुत मन्त्र में उसी की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि (सः) = वह तू ऊर्जः नपातम् शक्ति को न नष्ट होने देनेवाले उस प्रभु को (हिन) = अपने उत्तम कर्मों व उपासनों से प्रीणित कर [ तर्पय - उ० ] [हि गतौ वृद्धौ च ] । उत्तम कर्मोपासनाओं से प्रभु की ओर जा और उस प्रभु की महिला को बढ़ानेवाला बन। २. (अयम्) = ये प्रभु निश्चय से (अस्मयुः) = हमारे हित की कामनावाले हैं, हमें चाहते हैं, हमें प्यार करते हैं । ३. (हव्यदातये) = हव्य पदार्थों के दान के लिए (दाशेम) = हम उस प्रभु के प्रति अपना अर्पण कर दें, तो वे प्रभु हमें वाजेषु वासनाओं के साथ होनेवाले संग्रामों में (अविता भुवत्) = हमारे रक्षक होते हैं। वे प्रभु इस शरणागत की (वृधे) = वृद्धि व उन्नति के लिए भुवत् होते हैं। प्रभु के प्रति अर्पण करने पर, वे जिधर चलाएँ, उधर ही चलने पर हमारी उन्नति ही उन्नति होगी। (उत) = और वे प्रभु हमारे (तनूनाम्) = शरीरों के भी (त्राता) = रक्षक होते हैं। वे हमारी शक्तियों का विस्तार करते हैं और हमें आधि-व्याधियों से बचाते हैं । ५. इस प्रकार प्रभु के प्रति अपना अर्पण करके यह व्यक्ति अत्यन्त शान्त जीवनवाला होता हुआ मन्त्र का ऋषि 'शंयु' बनता है।
Essence
भावार्थ- हम अपने कर्मों से प्रभु को प्रीणित करें। वे हमारा भला ही भला चाहते हैं। उनके प्रति हम अपना अर्पण कर दें, वे वासना-संग्राम में हमारी रक्षा करेंगे, हमारी वृद्धि का कारण होंगे, हमें आधि-व्याधियों से बचाएँगे।
Subject
प्रभु के प्रति अर्पण