Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 38

44 Mantra
27/38
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः Chhand- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स त्वं न॑श्चित्र वज्रहस्त धृष्णु॒या म॒ह स्त॑वा॒नोऽअ॑द्रिवः।गामश्व॑ꣳ र॒थ्यमिन्द्र॒ संकि॑र स॒त्रा वाजं॒ न जि॒ग्युषे॑॥३८॥

सः। त्वम्। नः॒। चि॒त्र॒। व॒ज्र॒ह॒स्तेति॑ वज्रऽहस्त। धृ॒ष्णु॒येति॑ धृष्णु॒ऽया। म॒हः। स्त॒वा॒नः। अ॒द्रि॒व॒ इत्य॑द्रिऽवः। गाम्। अश्व॑म्। र॒थ्य᳖म्। इ॒न्द्र॒। सम्। कि॒र॒। स॒त्रा। वाज॑म्। न। जि॒ग्युषे॑ ॥३८ ॥

Mantra without Swara
स त्वन्नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानोऽअद्रिवः । गामश्वँ रथ्यमिन्द्र सङ्किर सत्रा वाजन्न जिग्युषे ॥

सः। त्वम्। नः। चित्र। वज्रहस्तेति वज्रऽहस्त। धृष्णुयेति धृष्णुऽया। महः। स्तवानः। अद्रिव इत्यद्रिऽवः। गाम्। अश्वम्। रथ्यम्। इन्द्र। सम्। किर। सत्रा। वाजम्। न। जिग्युषे॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभो! (सः त्वम्) = वे आप जोकि (चित्र:) = अन्दुत हैं, जिनके समान न कोई है और न होगा, (वज्रहस्त) = [वजगतौ] सदा क्रियाशील हाथोंवाले है, अर्थात् स्वाभाविक क्रियावाले हैं, और जो आप (धृष्णुया महः) = शत्रुओं के धर्षक तेजवाले हो (अद्रिवः) = [न] अपने मार्ग से विदीर्ण न किये जानेवाले हैं- अच्युत हैं। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली आप ! (स्तवान:) = स्तुति किये (गाम्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियों को (अश्वः) = उत्तम कर्मेन्द्रियों को जो (रथ्यम्) = शरीररूप रथ के लिए अत्यन्त हितकर हैं, उनको (नः संकिर) = हमारे लिए दीजिए । २. आप हमे (जिग्युषे) = विजयशील पुरुष के लिए (न) = जैसे (वाजम्) = बल को प्राप्त कराते है, उसी प्रकार (सत्रा) = सचमुच शक्ति प्राप्त कराइए, जिससे जीवन-संग्राम में हम विजयी बनें। ३. 'चित्र' शब्द की भावना 'चित्र' = ज्ञान देनेवाले की है। वे प्रभु ज्ञान देकर ही तो हमें इस संसार में विजयी बनाते हैं। ४. उस प्रभु का स्तवन यही है कि हम भी (वज्रहस्त) = क्रियाशील बनें, (धृष्णुया महः) = शत्रुधर्षक तेजस्विता का सम्पादन करें, (अद्रिवः) = वज्रतुल्य दृढ शरीरवाले व दृढनिश्चयी बनें, तभी हम प्रभु से उस शक्ति की याचना के अधिकारी बनते हैं, जो शक्ति हमें विजयी बनाती है।
Essence
भावार्थ- हे प्रभो! हमें उत्तम ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ प्राप्त कराइए। हमें वह शक्ति दीजिए जोकि हमें विजयी बनाए ।
Subject
शत्रुओं का धर्षण व विजय