Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 31

44 Mantra
27/31
Devata- वायुर्देवता Rishi- अजमीढ ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा॒युर॑ग्रे॒गा य॑ज्ञ॒प्रीः सा॒कं ग॒न्मन॑सा य॒ज्ञम्।शि॒वो नि॒युद्भिः॑ शि॒वाभिः॑॥३१॥

वा॒युः। अ॒ग्रे॒गाऽइत्य॑ग्रे॒ऽगाः। य॒ज्ञ॒प्रीरिति॑ यज्ञ॒ऽप्रीः। सा॒कम्। ग॒न्। मन॑सा। य॒ज्ञम्। शि॒वः। नि॒युद्भि॒रिति॑ नि॒युत्ऽभिः॑। शि॒वाभिः॑ ॥३१ ॥

Mantra without Swara
वायुरग्रेगा यज्ञप्रीः साकङ्गन्मनसा यज्ञम् । शिवो नियुद्भिः शिवाभिः ॥

वायुः। अग्रेगाऽइत्यग्रेऽगाः। यज्ञप्रीरिति यज्ञऽप्रीः। साकम्। गन्। मनसा। यज्ञम्। शिवः। नियुद्भिरिति नियुत्ऽभिः। शिवाभिः॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (वायुः) = वे प्रभु सम्पूर्ण गति का स्रोत हैं । २. (अग्रेगाः) = वे प्रभु हमें निरन्तर आगे और आगे ले चलनेवाले हैं। हमारी सब प्रकार की उन्नति प्रभुकृपा से ही तो सिद्ध होती है । ३. (यज्ञप्री:) = यज्ञों के द्वारा वे प्रभु प्रीणित होते हैं। हम यज्ञशील बनकर प्रभु की कृपा के पात्र बनते हैं। ४. वे प्रभु (मनसा साकम्) = मन के साथ (यज्ञम् गत्) = यज्ञ को प्राप्त हों, अर्थात् जब हम यज्ञ करें तब प्रभुकृपा से हमें ऐसा उत्तम मन प्राप्त हो कि हमारी यह यज्ञिय वृत्ति और बढ़ती जाए। ५. वे प्रभु (शिवाभिः नियुद्भिः) = सदा शुभ कार्यों में प्रवृत्त होनेवाले इन्द्रियाश्वों से (शिवः) = हमारा कल्याण करेनवाले हैं। इन्द्रियों की उत्तमता में ही सुख है, सु+ख ।
Essence
भावार्थ- प्रभु की आराधना के लिए हम यज्ञशील हों। 'यज्ञप्री:' प्रभु को हम यज्ञ से ही आराधित कर सकेंगे।
Subject
पुरुमीढ का प्रभु-स्तवन