Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 30

44 Mantra
27/30
Devata- वायुर्देवता Rishi- पुरुमीढ ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वायो॑ शु॒क्रोऽ अ॑यामि ते॒ मध्वो॒ऽअग्रं॒ दिवि॑ष्टिषु। आ या॑हि॒ सोम॑पीतये स्पा॒र्हो दे॑व नि॒युत्व॑ता॥३०॥

वायो॒ऽइति॒ वायो॑। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒। मध्वः॑। अग्र॑म्। दिवि॑ष्टिषु। आ। या॒हि॒। सोम॑ऽपीतय॒ इति॒ सोम॑पीतये। स्पा॒र्हः। दे॒व॒। नि॒युत्व॑ता ॥३० ॥

Mantra without Swara
वायो शुक्रोऽअयामि ते मध्वोऽअग्रंदिविष्टिषु । आ याहि सोमपीतये स्पार्हा देव नियुत्वता ॥

वायोऽइति वायो। शुक्रः। अयामि। ते। मध्वः। अग्रम्। दिविष्टिषु। आ। याहि। सोमऽपीतय इति सोमपीतये। स्पार्हः। देव। नियुत्वता॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का 'गृत्समद' जब लोकहित में प्रवृत्त होता है तब वह 'पुरुमीढ' = बहुत पर सुखों की वृष्टि करनेवाला व 'अजमीढ' [अज गतिक्षेपणयो: ] = क्रियाशीलता से बुराइयों को दूर करके कल्याण की वृष्टि करनेवाला बनता है और प्रभु से कहता है कि हे (वायो) = गतिशील प्रभो ! (शुक्रः) = गतिशील बनकर [शुक गतौ] मैं (ते अयामि) = आपको प्राप्त होता हूँ। २. आपकी उपासना से शक्ति सम्पन्न होकर मैं (दिविष्टिषु) = [दिव् इष्टि] ज्ञानयज्ञों में (मध्वाः अग्रम्) = माधुर्य के अग्रभाग को (अयामि) = प्राप्त कराता हूँ, अर्थात् अत्यन्त माधुर्य से जनहित के लिए ज्ञानयज्ञ का विस्तार करता हूँ, प्रजाओं में ज्ञान को फैलाने का प्रयत्न करता हूँ और इस ज्ञानविस्तार के कार्य में अत्यन्त माधुर्य को स्थिर बनाये रखता हूँ। ३. हे (देव) = सब ज्ञानदीप्तियों के देनेवाले प्रभो! आप ही (स्पार्ह:) = स्पृहणीय हैं। चाहिए तो यही कि हम आपको प्राप्त करने का प्रयत्न करें, आपको प्राप्त कर लेने पर सब-कुछ प्राप्त हो ही जाता है। हे देव! (नियुत्वता) = उत्तम इन्द्रियोंवाले इस 'शरीर-रथ' के हेतु से (आयाहि) = आप हमें प्राप्त होइए। आपकी प्राप्ति में, आपकी उपासना में ही इन इन्द्रियाश्वों को निर्मल करने की शक्ति है। आप हमें इसलिए प्राप्त होओ कि हम (सोमपीतये) = सोम का पान कर सकें, शक्ति को शरीर में ही सुरक्षित रख सकें। आपके प्राप्त होने पर वासनाओं का सहज विनाश हो जाता है और यह वासना-विनाश शक्ति की रक्षा में सहायक होता है।
Essence
भावार्थ- हम शुद्ध जीवनवाले बनकर प्रभु को प्राप्त हों। ज्ञान प्रचार के कार्य में अत्यन्त माधुर्य को बनाये रक्खें। सोम की रक्षा के लिए प्रभु -प्राप्ति की प्रबल कामनावाले हों।
Subject
माधुर्य का शिखर