Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 25

44 Mantra
27/25
Devata- प्रजापतिर्देवता स्वराट् Rishi- हिरण्यगर्भ ऋषिः Chhand- स्वराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आपो॑ ह॒ यद् बृ॑ह॒तीर्विश्व॒माय॒न् गर्भं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर॒ग्निम्। ततो॑ दे॒वाना॒ सम॑वर्त्त॒तासु॒रेकः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥२५॥

आपः॑। ह॒। यत्। बृ॒ह॒तीः। विश्व॑म्। आय॑न्। गर्भ॑म्। दधा॑नाः। ज॒नय॑न्तीः। अ॒ग्निम्। ततः॑। दे॒वाना॑म्। सम्। अ॒व॒र्त्त॒त॒। असुः॑। एकः॑। कस्मै॑। दे॒वाय॑। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
आपो ह यद्बृहतीर्विश्वमायन्गर्भन्दधाना जनयन्तीरग्निम् । ततो देवानाँ समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

आपः। ह। यत्। बृहतीः। विश्वम्। आयन्। गर्भम्। दधानाः। जनयन्तीः। अग्निम्। ततः। देवानाम्। सम्। अवर्त्तत। असुः। एकः। कस्मै। देवाय। हविषा। विधेम॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का वसिष्ठ प्रभु का ध्यान करता है, प्रभु को सम्पूर्ण प्रकृति के गर्भ में देखता है और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पिण्डों को प्रभु के गर्भ में। इस प्रकार प्रभु की हिरण्यगर्भ रूप में उपासना करने के कारण प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'हिरण्यगर्भ' ही हो जाता है। यह ऐसा ज्ञान प्राप्त करता है कि (यत्) = अब (बृहती:) = ये अत्यन्त बढ़े हुए महान् (आपः) = व्यापक तत्त्व [साम्यावस्थारूप में प्रकृति] इस जगत् का उपादानकारणभूत एक फैला हुआ मेघ [Nebula=नभस्], (विश्वम्) = उस सर्वत्र प्रविष्ट प्रभु को (गर्भं दधाना) = अपने गर्भ में धारण करते हुए (अग्निम्) = अग्नि आदि देवों को- द्युलोक में सूर्यरूप से रहनेवाली, अन्तरिक्ष में विद्युत् और पृथिवी पर अग्निरूप से रहनेवाली इस अग्नि को (जनयन्ती:) = पैदा करता हुआ (आयन्) = गति करता है । (ततः) = उस समय (देवानाम्) = इन सब देवों का (असुः) = प्राण (एकः) = यह अद्वितीय परमात्मा ही (समवर्त्तत) = होता है। वस्तुतः शरीर का वर्धन जैसे अन्तःस्थित आत्मतत्त्व पर निर्भर है, इसी प्रकार इस संसार के उपादानकारणभूत उस (आपः) = व्यापकतत्त्व का वर्धन अन्त:स्थित प्रभु पर निर्भर है। इन (आपः) = साम्यवस्थावाली प्रकृति से बने हुए इन सूर्यादि देवों का प्राण यह अद्वितिय परमात्मा ही है। उस प्रभु की दीप्ति से ही सूर्यादि ये सब देव दीप्त होते रहे हैं। २. उस (कस्मै) = अनिर्वचनीय महिमावाले (दैवाय) = दीप्तरूप प्रभु के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन से अथवा आत्मसमर्पण से (विधेम) = हम पूजा करनेवाले हों।
Essence
भावार्थ- सृष्टि के मूल व्यापक तत्त्व में प्रभु गर्भरूप से स्थित न होते तो उस मूलतत्त्व से अग्नि आदि देवों की उत्पत्ति ही न होती। वे प्रभु ही इन सूर्यादि देवों के देवत्व का कारण हैं। उस अनिर्वचनीय महिमावाले देव के प्रति हम समर्पण द्वारा आराधना करनेवाले हों।
Subject
देवों का प्राण