Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 17

44 Mantra
27/17
Devata- यज्ञो देवता Rishi- अग्निर्ऋषिः Chhand- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तेऽअ॑स्य॒ योष॑णे दि॒व्ये न योना॑ऽ उ॒षासा॒नक्ता॑। इ॒मं य॒ज्ञम॑वतामध्व॒रं नः॑॥१७॥

ते इति॒ ते। अ॒स्य॒। योष॑णे॒ इति॒ योष॑णे। दि॒व्ये इति॑ दि॒व्ये। न। योनौ॑। उ॒षासा॒नक्ता॑। उ॒षसा॒नक्तेत्यु॒षसा॒नक्ता॑। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। अ॒व॒ता॒म्। अ॒ध्व॒रम्। नः॒ ॥१७ ॥

Mantra without Swara
तेऽअस्य योषणे दिव्ये न योनाऽउषासानक्ता । इमँयज्ञमवतामध्वरन्नः ॥

ते इति ते। अस्य। योषणे इति योषणे। दिव्ये इति दिव्ये। न। योनौ। उषासानक्ता। उषसानक्तेत्युषसानक्ता। इमम्। यज्ञम्। अवताम्। अध्वरम्। नः॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अस्य) = इस 'अग्नि' प्रगतिशील जीव के योना-घर में (ते) = वे (दिव्ये न योषणे न) = दिव्य पत्नियों के समान (उषासानक्ता) = दिन और रात (इमम् यज्ञम्) = इस यज्ञ को (अवताम्) = रक्षित करें। उस यज्ञ को रक्षित करें जो (नः) = हमारी (अध्वरम्) = न हिंसा होने देनेवाला है । २. घर में पत्नी 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' इस सूत्र के अनुसर यज्ञ में संयोग देने के लिए ही तो है। 'दिव्ये' विशेषण पत्नी की अभौतिक वृत्ति का संकेत देता है। संसार के भोगों में अनासक्ति हाने पर ही यज्ञियवृत्ति का विकास सम्भव है। 'दिन रात' हमारी दिव्य - पत्नियों के समान हों और ये हमारे घरों में निरन्तर यज्ञ को अविच्छिन्न रक्खें, अर्थात् हमारे घरों में प्रातः - सायं यज्ञ अवश्य चले । ३. अथर्ववेद के अनुसार, ('सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता') = १९।५५/३ सायंकाल किया हुआ अग्निहोत्र प्रातः तक सौमनस्य को देनेवाला होता है और ('प्रातः प्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनसस्य दाता') = १९।५५/४ प्रातः काल में किया हुआ अग्निहोत्र सायंकाल तक सौमनस्य देनेवाला होता है। इस प्रकार ये (उषासानक्ता) = दिन-रात दिव्य पत्नियों को कहते हैं कि ('वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतहिमा ऋधेम') = १९।५५/४ हे अग्ने ! तू सब वसुओं को, निवास के लिए आवश्यक वसुओं को देनेवाला है। हम तेरा समिन्धन करते हुए सौ वर्षपर्यन्त वृद्ध हों, फूलें-फलें ।
Essence
भावार्थ- हम घरों में दिन-रात यज्ञ करनेवाले हों। ये यज्ञ हमारे लिए अहिंसक बनें। हमें अहिंसित करके ये हमारे फूलने-फलने का कारण बनें।
Subject
यज्ञ की अहिंसकता [ अध्वरता ]