Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 12

44 Mantra
27/12
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- अग्निर्ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तनू॒नपा॒दसु॑रो वि॒श्ववे॑दा दे॒वो दे॒वेषु॑ दे॒वः।प॒थो अ॑नक्तु॒ मध्वा॑ घृ॒तेन॑॥१२॥

तनू॒नपा॒दिति॒ तनू॒ऽनपा॑त्। असु॑रः। वि॒श्ववे॑दा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः। दे॒वः। दे॒वेषु॑। दे॒वः। प॒थः। अ॒न॒क्तु॒। मध्वा॑। घृ॒तेन॑ ॥१२ ॥

Mantra without Swara
तनूनपादसुरो विश्ववेदा देवो देवेषु देवः । पथोऽअनक्तु मध्वा घृतेन् ॥

तनूनपादिति तनूऽनपात्। असुरः। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः। देवः। देवेषु। देवः। पथः। अनक्तु। मध्वा। घृतेन॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यह 'अग्नि' (तनूनपात्) = अपने शरीर को न गिरने देनेवाला है। सात्त्विक व पौष्टिक भोजनों का सेवन करने से यह शरीर को ढीला नहीं होने देता। २. (असुर:) = [असुमान् प्राणवान् - उ० ] यह प्राणशक्ति सम्पन्न होता है। यह प्राणशक्तिप्रद भोजनों का सेवन करता है और संयमी जीवन बिताता हुआ प्राणशक्ति में कमी नहीं आने देता। ३. (विश्ववेदाः) आवश्यक धनों का अर्जन करता है और सम्पूर्ण ज्ञानवाला होता है। ४. (देवः) = दानादि गुणयुक्त होता है। 5. देवेषु देवः । यह (पथ:) = अपने जीवन मार्गों को (मध्वा) = माधुर्य से और (घृतने) = [घृ क्षरण] मलों के क्षरण, अर्थात् नैर्मल्य से तथा [घृ दीप्ति] ज्ञान की दीप्ति से (अनक्तु) = अलंकृत करे, अर्थात् इसके सारे कार्यों में माधुर्य, नैर्मल्य व दीप्ति का पुट हो ।
Essence
भावार्थ- हम शरीर को स्वस्थ व प्राणशक्ति सम्पन्न बनाएँ, ज्ञानी व धनी बनें, देववृत्ति-वाले, देवों के भी देव बनें। हमारे व्यवहार मुधर, निर्मल व समझदारी को लिये हुए हों।
Subject
माधुर्य, नैर्मल्य व दीप्ति