Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 11

44 Mantra
27/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अग्निर्ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वाऽ अ॑स्य स॒मिधो॑ भवन्त्यू॒र्ध्वा शु॒क्रा शो॒चीष्य॒ग्नेः।द्यु॒मत्त॑मा सु॒प्रती॑कस्य सू॒नोः॥११॥

ऊ॒र्ध्वाः। अ॒स्य॒। स॒मिध॒ इति॑ स॒म्ऽइधः॑। भ॒व॒न्ति॒। ऊ॒र्ध्वा। शु॒क्रा। शो॒चीषि॑। अ॒ग्नेः। द्यु॒मत्त॒मेति॑ द्यु॒मत्ऽत॑मा। सु॒प्रती॑क॒स्येति॑ सु॒ऽप्रती॑कस्य। सू॒नोः ॥११ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वाऽअस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचीँष्यग्नेः । द्युमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः ॥

ऊर्ध्वाः। अस्य। समिध इति सम्ऽइधः। भवन्ति। ऊर्ध्वा। शुक्रा। शोचीषि। अग्नेः। द्युमत्तमेति द्युमत्ऽतमा। सुप्रतीकस्येति सुऽप्रतीकस्य। सूनोः॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अस्य अग्नेः) = इस उत् से उत्तर तथा उत्तर से उत्तम की ओर जानेवाले अग्नि की (समिध) = दीप्तियाँ (ऊर्ध्वा भवन्ति) = उत्कृष्ट होती हैं। इसकी एक-एक इन्द्रिय शक्ति सम्पन्न होती है, सब इन्द्रियाँ दीप्त प्रतीत होती हैं। स्वास्थ्य की दीप्ति इसे चमकानेवाली होती है। ३. इस अग्नि की (शुक्रा) = अत्यन्त शुद्ध शोचींषि मानस पवित्रताएँ, मानस संकल्पों की शुद्धता में (ऊर्ध्वा) = अत्यन्त उत्कृष्ट होती हैं। इसका शरीर नीरोग होता है तो इसका मन भी पूर्ण निर्मल होता है । ३. इस शारीरिक स्वास्थ्य व मानस निर्मलता के कारण (सुप्रतीकस्य सूनोः) = अत्यन्त प्रसन्नवदनवाले व्यक्ति का ज्ञान (द्युमत्तमा) = अत्यन्त द्युतिवाला होता है।
Essence
भावार्थ - प्रगतिशील जीव की इन्द्रियाँ शक्तियों से चमकती हैं, इसकी मानस पवित्रताएँ, इसका ज्ञान अत्यन्त दीप्त होते हैं। इस प्रकार शरीर व चमकते हुए मस्तिष्कवाला यह अग्नि चमकते हुए मुखवाला व प्रसन्नवदन होता है।
Subject
चमकता हुआ [सुप्रतीक]