Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 4

26 Mantra
26/4
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- रम्याक्षी ऋषिः Chhand- स्वराड् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ गोम॑न्नि॒हा या॑हि॒ पिबा॒ सोम॑ꣳ शतक्रतो। वि॒द्यद्भि॒र्ग्राव॑भिः सु॒तम्।उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा॒ गोम॑तऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा॒ गोम॑ते॥४॥

इन्द्र॑। गोम॒न्निति॒ गोऽम॑न्। इ॒ह। आ। या॒हि॒। पिब॑। सोम॑म्। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। वि॒द्यद्भि॒रिति॒ वि॒द्यत्ऽभिः॑। ग्राव॑भि॒रिति॒ ग्राव॑ऽभिः। सु॒तम्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। गोम॑त॒ इति॒ गोऽम॑ते। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। इन्द्रा॑य। त्वा॒। गोम॑त इति॒ गोऽम॑ते ॥४ ॥

Mantra without Swara
इन्द्र गोमन्निहायाहि पिबा सोमँ शतक्रतो । विद्यद्भिर्ग्रावभिः सुतम् । उपयामगृहीतो सीन्द्राय त्वा गोमतऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा गोमते ॥

इन्द्र। गोामन्निति गोऽमन्। इह। आ। याहि। पिब। सोमम्। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। विद्यद्भिरितिः विद्यत्ऽभिः। ग्रावभिरिति ग्रावऽभिः। सुतम्। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इन्द्राय। त्वा। गोमत इति गोऽमते। एषः। ते। योनिः। इन्द्राय। त्वा। गोमत इति गोऽमते॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का 'गृत्समद' प्रस्तुत मन्त्रों में 'रम्याक्षी:' = रमणीय आँखोंवाला बनता है। प्रभु का कुछ-कुछ आभास होने पर मानस आह्लाद का आँखों में बसना स्वाभाविक है। यह रम्याक्षि कहता है कि हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (गोमन्) = वेदवाणियोंवाले प्रभो ! (इह) = इस मानव-जीवन में (आयाहि) = आप हमें प्राप्त हों। ३. इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु रम्याक्षि से कहते हैं कि हे (शतक्रतो:) = सैकड़ों प्रज्ञानोंवाले व शतवर्षपर्यन्त यज्ञमय जीवन बितानेवाले रम्याक्षे ! तू (सोमं पिब) = सोम का पान कर। शरीर में उत्पन्न इस सोम को शरीर में ही सुरक्षित करनेवाला बन। यह सोम (विद्यद्भिः) [दो अवखण्डने ] = विशेषरूप से वासनाओं का खण्डन करनेवालों से तथा (ग्रावभिः) = स्तोताओं [ गृणन्ति इति - द० ] से (सुतम्) = अपने अन्दर उत्पन्न किया जाता है। सोमरक्षा के लिए हम अपने अन्दर वासनाओं को उत्पन्न न होने दें और प्रभु का स्तवन करनेवाले बनें। ३. अब रम्याक्षि कहता है- हे प्रभो! (उपयामगृहीतः असि) = आप उपासना द्वारा प्राप्त यम-नियमों से जाने जाते हो। हे वेद! मैं (त्वा) = तुझे (इन्द्राय गोमते) = इस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिए ही प्राप्त करता हूँ, जोकि वेदवाणियोंवाला है। (एषः) = यह प्रभु ही (ते) = तेरा (योनिः) = उत्पत्तिस्थान है। (इन्द्राय गोमते) = मैं तुझे उस सब आसुरवृत्तियों का संहार करनेवाले वेदवाणियों के पति प्रभु की प्राप्ति के लिए ही स्वीकार करता हूँ।
Essence
भावार्थ- प्रभु-प्राप्ति के लिए वीर्य की रक्ष और सोम का पान आवश्यक है। इसके साधन हैं, वासनाओं से बचना व प्रभु का स्तवन करना । वेदज्ञान भी प्रभु प्राप्ति के लिए ही है। -
Subject
वासना-विनाश व स्तवन