Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 24

26 Mantra
26/24
Devata- विद्वान् देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒मेव॑ नः सुहवा॒ऽआ हि गन्त॑न॒ नि ब॒र्हिषि॑ सदतना॒ रणि॑ष्टन।अथा॑ मदस्व जुजुषा॒णो ऽअन्ध॑स॒स्त्वष्ट॑र्दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः सु॒मद्ग॑णः॥२४॥

अ॒मेवेत्य॒माऽइ॑व। नः॒। सु॒ह॒वा॒ऽइति॑ सुऽहवाः। आ। हि। गन्त॑न। नि। ब॒र्हिषि॑। स॒द॒त॒न॒। रणि॑ष्टन। अथ॑। म॒द॒स्व॒। जु॒जु॒षा॒णः। अन्ध॑सः। त्वष्टः॑। दे॒वेभिः॑। जनि॑भि॒रिति॒ जनि॑ऽभिः। सु॒मद्ग॑ण॒ इति॑ सु॒मत्ऽग॑णः ॥२४ ॥

Mantra without Swara
अमेव नः सुहवाऽआ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन । अथा मन्दस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवेभिर्जनिभिः सुमद्गणः ॥

अमेवेत्यमाऽइव। नः। सुहवाऽइति सुऽहवाः। आ। हि। गन्तन। नि। बर्हिषि। सदतन। रणिष्टन। अथ। मदस्व। जुजुषाणः। अन्धसः। त्वष्टः। देवेभिः। जनिभिरिति जनिऽभिः। सुमद्गण इति सुमत्ऽगणः॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'गृत्समद' है- 'गृणाति माद्यति' प्रभु-स्तवन करता है और प्रसन्न रहता है। यह विद्वानों से कहता है कि (नः) = हमारे लिए (सुहवा:) = सुगमता से पुकारने योग्य आप लोग अमा इव अपने घर की भाँति (हि) = निश्चय से (आगन्तन) = आइए। आपको आमन्त्रित करना हमारे लिए दुष्कर न हो जाए, आप हमारे घर को अपना ही घर समझें और यहाँ (बर्हिषि) = दर्भासन पर (निसदतन) = स्थिरता से विराजिए और (रणिष्टन) = उपदेश दीजिए, अर्थात् हम विद्वानों को आमन्त्रित करें, वे हमारे घर में अपने घर की भाँति ही सुविधा अनुभव करें और आसन पर बैठकर हमें समुचित उपदेश दें । २. उपदेश का स्वरूप इस प्रकार है कि [क] (अथा मन्दस्व) = [ अ = परमात्मा, of protection रक्षा] उस प्रभु के रक्षण में आनन्द का अनुभव कर, अर्थात् हम अपने को उस प्रभु के अमृत उपस्तरण व अपिधान में सुरक्षित अनुभव करते हुए आनन्दयुक्त मनवाले हों। [ख] (जुजुषाण:) = उस प्रभु के रक्षण में अपने कर्तव्य कर्मों को प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाले हों। [ग] हे (अन्धसः) = आध्यायनीय सोम की रक्षा से (त्वष्टः) = [त्विषि- दीप्तौ ] अपने ज्ञान को दीप्त करनेवाले साधक! तू (देवेभिः) = दिव्यगुणों के द्वारा तथा (जनिभिः) = अपनी शक्तियों के विकास के द्वारा (सुमद्गणः) = बड़ी प्रसन्न ज्ञानेन्द्रियों के गणवाला उसी प्रकार सुदृढ़ कर्मेन्द्रियों के गणवाला तथा प्रसन्न प्राणपञ्चकवाला बन।
Essence
भावार्थ- हमें विद्वान् लोग प्राप्त हों, उनके सदुपदेश को सुनकर हम आनन्दमय मनोवृत्तिवाले बनें, कर्त्तव्यों को प्रीतिपूर्वक करें, सोमरक्षा द्वारा ज्ञान को दीप्त करते हुए दिव्य गुणोंवाले बनें, शक्तियों का विकास करें तथा प्रकृष्ट ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों व प्राणोंवाले बनें।
Subject
विद्वत् समागम