Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 20

26 Mantra
26/20
Devata- विद्वान् देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ पत्नी॑रि॒हा व॑ह दे॒वाना॑मुश॒तीरुप॑। त्वष्टा॑र॒ꣳ सोम॑पीतये॥२०॥

अग्ने॑। पत्नीः॑। इ॒ह। आ। व॒ह॒। दे॒वाना॑म्। उ॒श॒तीः। उप॑। त्वष्टा॑रम्। सोम॑पीतय॒ इति॒ सोम॑ऽपीतये ॥२० ॥

Mantra without Swara
अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारँ सोमपीतये ॥

अग्ने। पत्नीः। इह। आ। वह। देवानाम्। उशतीः। उप। त्वष्टारम्। सोमपीतय इति सोमऽपीतये॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि 'मेधातिथि' है, यह निरन्तर बुद्धि की ओर अग्रसर हो रहा है [मेधाम् अतति] अथवा यह सदा बुद्धिपूर्वक ही संसार में चलता है [मेधया अतति ] । इस मेधातिथि से प्रभु कहते हैं कि हे (अग्ने) = जीवन-यात्रा में निरन्तर आगे बढ़नेवाले जीव ! (इह) = इस मानव जन्म में तू (उशती:) = [ कामयमानाः ] सदा लोकहित की कामना करता हुआ (देवनाम् पत्नी:) = शरीर में वाणी इत्यादि के रूप से रहनेवाले अग्नि आदि देवों की पत्नियों को, शक्तियों को (उपावह) = समीपता से प्राप्त करनेवाला हो । २. तू (सोमपीतये) = सोम के पान के लिए, अर्थात् शरीर में सोम को सुरक्षित रखने के लिए (त्वष्टारम्) = त्वष्टा को [ त्विषेर्वा स्याद्दीप्तिकर्मणः, त्वषतेर्वा करोतिकर्मणः] ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा दीप्ति को प्राप्त करनेवाला बन । सोम की रक्षा के लिए आवश्यक है मनुष्य को ज्ञान प्राप्ति की प्रबल उत्कण्ठा हो । उसे आलस्य से घृणा हो, ज्ञान प्राप्ति व क्रियाशलता सोमरक्षा के साधन हैं।
Essence
भावार्थ- आगे बढ़ने का अभिप्राय है जीवन में दिव्य गुणों को आमन्त्रित करना। दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए सोमरक्षा आवश्यक है। सोम को शरीर में ही व्याप्त करने के लिए हम त्वष्टा बनें, सदा ज्ञान की प्राप्ति करनेवाले तथा क्रियाशील जीवनवाले हों।
Subject
देव-पत्नी तथा त्वष्टा