Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 19

26 Mantra
26/19
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- मुद्गल ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॑ वी॒रैरनु॑ पुष्यास्म॒ गोभि॒रन्वश्वै॒रनु॒ सर्वे॑ण पु॒ष्टैः। अनु॒ द्विप॒दाऽनु॒ चतु॑ष्पदा व॒यं दे॒वा नो॑ य॒ज्ञमृ॑तु॒था न॑यन्तु॥१९॥

अनु॑। वी॒रैः। अनु॑। पु॒ष्या॒स्म॒। गोभिः॑। अनु॑। अश्वैः॑। अनु॑। सर्वे॑ण। पु॒ष्टैः। अनु॑। द्विप॒देति॒ द्विऽप॑दा। अनु॑। चतु॑ष्पदा। चतुः॑प॒देति॒ चतुः॑पदा। व॒यम्। दे॒वाः। नः॒। य॒ज्ञम्। ऋ॒तु॒थेत्यृ॑तु॒ऽथा। न॒य॒न्तु॒ ॥१९ ॥

Mantra without Swara
अनु वीरैरनु पुष्यास्म गोभिरन्वश्वैरनु सर्वेण पुष्टैः । अनु द्विपदानु चतुष्पदा वयन्देवा नो यज्ञमृतुथा नयन्तु ॥

अनु। वीरैः। अनु। पुष्यास्म। गोभिः। अनु। अश्वैः। अनु। सर्वेण। पुष्टैः। अनु। द्विपदेति द्विऽपदा। अनु। चतुष्पदा। चतुःपदेति चतुःपदा। वयम्। देवाः। नः। यज्ञम्। ऋतुथेत्यृतुऽथा। नयन्तु॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के यज्ञ के अनुपात में (वीरै:) = वीर पुत्रों से (अनुपुष्यास्म) = हम पोषण को प्राप्त करें। जितना जितना हमारा जीवन यज्ञिय होता है उतना उतना हमारे सन्तान भी वीर बनते हैं। वस्तुतः भोगमार्ग हमारी शक्तियों को क्षीण करता है, हमारी शक्तियों की क्षीणता के साथ हमारी सन्ताने भी निर्बल होती हैं। २. (गोभिः अश्वैः अनु) [पुष्यास्म] = हम गौवों व घोड़ों से पोषण को प्राप्त हों। हमारे घरों में गौवें हों, घोड़े हों और उनसे हमारे ब्रह्म व क्षत्र का पोषण हो। अथवा 'गाव ज्ञानेन्द्रियाणि, अश्वाः कर्मेन्द्रियाणि' हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ ठीक पोषण से युक्त हों। वस्तुत: यज्ञिय वृत्ति हमारी इन्द्रियों को अक्षीण-शक्ति बनाती है । ३. (सर्वेण अनु) [पुष्यास्म] = अन्य भी सब चाहने योग्य शक्तियों के पोषणवाले हम हों, (पुष्टैः) = पुष्टि के साधनभूत गृह आदि सब पदार्थों से (अनु)- [पुष्यास्म] = हम अनुपुष्ट हों । ४. (द्विपदा) = दो पाँवोंवाले मनुष्यों से (अनु) [पुष्यास्म] = पोषण को प्राप्त हों और चतुष्पदा वयम् [पुष्यास्म] चौपाये गौ आदि पशुओं से हम पोषण प्राप्त करनेवाले हों। ५. इस पोषण के उद्देश्य से ही (देवा:) = सब देव (नः) = हमें (यज्ञम्) = यज्ञ को (ऋतुथा) = ऋतु के अनुसार (नयन्तु) = प्राप्त कराएँ। हम प्रत्येक ऋतु में, ऋतु के अनुसार ही हविर्द्रव्यों से यज्ञ करनेवाले हों और यह यज्ञ हमें वीरों, गौवों, अश्वों तथा पोषण के लिए आवश्यक अन्य सब पदार्थों से पुष्ट करें। इन यज्ञों से मनुष्य व पशु सब हमारे अनुकूल हों और हमारे पोषण का कारण बनें।
Essence
भावार्थ - हमारी वृत्ति यज्ञिय हो । यज्ञों से हमें सब प्रकार का पोषण प्राप्त हो ।
Subject
यज्ञ व पोषण