Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 13

26 Mantra
26/13
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
एह्यू॒ षु ब्रवा॑णि॒ तेऽग्न॑ऽ इ॒त्थेत॑रा॒ गिरः॑। ए॒भिर्व॑र्द्धास॒ऽइन्दु॑भिः॥१३॥

आ। इ॒हि॒। ऊँ॒ इत्यूँ॑। सु। ब्रवा॑णि। ते॒। अग्ने॑। इ॒त्था। इत॑राः। गिरः॑। ए॒भिः। व॒र्द्धा॒से॒। इन्दु॑भि॒रितीन्दु॑ऽभिः ॥१३ ॥

Mantra without Swara
एह्यू षु ब्रवाणि तेग्नऽइत्थेतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥

आ। इहि। ऊँ इत्यूँ। सु। ब्रवाणि। ते। अग्ने। इत्था। इतराः। गिरः। एभिः। वर्द्धासे। इन्दुभिरितीन्दुऽभिः॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु की अर्चना से ज्ञान का प्रकाश तो प्राप्त होता ही है, प्रभु की शक्ति भी हममें प्रवाहित होती है और हम 'भारद्वाज' बनते है, अपने में शक्ति को भरनेवाले। इस भारद्वाज से प्रभु कहते हैं कि हे (अग्ने) = आगे बढ़ने की प्रवृत्तिवाले ! (एहि उ) = तुम मेरे समीप आओ ही, अर्थात् प्रातः-सायं मेरा ध्यान करने का प्रयत्न करो। २. मैं (ते) = तेरे लिए (इत्था) = इस प्रकार से, अर्थात् तेरे मेरे समीप आने से (गिरः) = उन वाणियों को (ब्रुवाणि) = उत्तमता से कहता हूँ जोकि (इतरा:) = [इ तराः] कामवासना से तुझे तैरानेवाली होती हैं, जिनके उच्चारण से तू वासना को जीत लेता है । ३. हे भारद्वाज ! तू (एभिः) = इन (इन्दुभिः) = सोमकणों से (वर्द्धासे) = वृद्धि को प्राप्त कर । तुझमें ये सोमकण उत्पन्न होते हैं, यदि तू इनकी सम्यक् रक्षा करेगा तो ये तेरे शरीर को नीरोग करनेवाले होंगे, तेरे मन को वासनाओं से बचाकर निर्मल बनाएँगे, तेरी ज्ञानाग्नि का ये ईंधन होंगे। इस प्रकार तेरी उन्नति उसी अनुपात में होगी जिस अनुपात में तू इन सोमकणों की रक्षा कर सकेगा।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु-सम्पर्क में आकर वेदवाणियों का श्रवण करें और सोम की रक्षा करनेवाले हों।
Subject
वेद का उपदेश