Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 26 / Mantra 10

26 Mantra
26/10
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
म॒हाँ२॥ऽइन्द्रो॒ वज्र॑हस्तः षोड॒शी शर्म॑ यच्छतु। हन्तु॑ पा॒प्मानं॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॑। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि महे॒न्द्राय॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॑र्महे॒न्द्राय॑ त्वा॥१०॥

म॒हान्। इन्द्रः॑। वज्र॑ह॒स्त इति॒ वज्र॑ऽहस्तः। षो॒ड॒शी। शर्म॑। य॒च्छ॒तु॒। हन्तु॑। पा॒प्मान॑म्। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। म॒हे॒न्द्रायेति॑ महाऽइ॒न्द्राय॑। त्वा॒। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। म॒हे॒न्द्रायेति॑ महाऽइ॒न्द्राय॑। त्वा॒ ॥१० ॥

Mantra without Swara
महाँ इन्द्रो वज्रहस्तः षोडशी शर्म यच्छतु । हन्तु पाप्मानँयोस्मान्द्वेष्टि । उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा ॥

महान्। इन्द्रः। वज्रहस्त इति वज्रऽहस्तः। षोडशी। शर्म। यच्छतु। हन्तु। पाप्मानम्। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। महेन्द्रायेति महाऽइन्द्राय। त्वा। एषः। ते। योनिः। महेन्द्रायेति महाऽइन्द्राय। त्वा॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्रों के अनुसार प्रभु को (महागय) = महान् गृह समझनेवाले और अतएव उत्तम निवासवाले ‘वसिष्ठ' कहते हैं कि (महान्) = वे प्रभु श्रेष्ठ हैं [ मह पूजायाम्] पूजनीय हैं। (इन्द्रः) = [इदि परमैश्वर्ये] वे परमैश्वर्यवाले हैं, [ इन्द to be powerful ] सर्वशक्तिमान् हैं। (वज्रहस्तः) = वज्र उनके हाथ में है, अर्थात् 'वज गतौ' वे सदा क्रियाशील हैं, ('स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च') = उनकी क्रिया स्वाभाविक है। ३. (षोडशी) = सोलह कलाओंवाले वे प्रभु, हमारे जीवनों को इन सोलह कलाओं से युक्त करके हमें अविकल [सकल] बनाकर (शर्म यच्छतु) = सुख व कल्याण प्राप्त कराएँ । प्रश्नोपनिषद् में इन 'प्राण' आदि सोलह कलाओं का वर्णन है। उनसे युक्त होने पर हमारा जीवन अविकल [अव्याकुल] व सम्पूर्ण = Whole स्वस्थ बनता है। ३. वे प्रभु हममें से (पाप्मानम् हन्तु) = पाप को नष्ट करें और उसको भी समाप्त करें (यः) = जो (अस्मान्) = हमारे साथ (द्वेष्टि) = प्रीति न करता हो। वस्तुतः जब हमारा पाप नष्ट हो जाता है तब हमारे साथ प्रीति न करनेवाला भी नहीं रहता । पापनाश 'शत्रुनाश' का कारण बनता है । ४. हे प्रभो! (उपयामगृहीतः असि) = आप अनन्यरूप से आपका ही भजन करने से गृहीत होते हो। ५. वसिष्ठ वेद को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि (त्वा) = तुझे हम उस (महेन्द्रायः) = महान् इन्द्र की प्राप्ति के लिए स्वीकारते हैं (एषः ते योनिः) = यह महेन्द्र ही तेरा उत्पत्तिस्थान है। (महेन्द्राय त्वा) = उस महान् इन्द्र की प्राप्ति के लिए तुझे ग्रहण करते हैं।
Essence
भावार्थ- प्रभु 'महान्, इन्द्र, वज्रहस्त व षोडशी हैं', वे हमारा कल्याण करते हैं। हमारे करते हैं। हम वेदज्ञान द्वारा प्रभु को पाने पाप को नष्ट कर सभी को हमारे प्रति प्रीतियुक्त का प्रयत्न करें।
Subject
महाँ इन्द्र