Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 45

39 Mantra
25/45
Devata- प्रजा देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒गव्यं॑ नो वा॒जी स्वश्व्यं॑ पु॒ꣳसः पु॒त्राँ२ऽउ॒त वि॑श्वा॒पुष॑ꣳ र॒यिम्।अ॒ना॒गा॒स्त्वं नो॒ऽअदि॑तिः कृणोतु क्ष॒त्रं नो॒ऽअश्वो॑ वनता ह॒विष्मा॑न्॥४५॥

सु॒गव्य॒मिति॑ सु॒ऽगव्य॑म्। नः॒। वा॒जी। स्वश्व्य॒मिति॑ सु॒ऽअश्व्य॑म्। पुं॒सः। पु॒त्रान्। उ॒त। वि॒श्वा॒पुष॑म्। वि॒श्वु॒पुष॒मिति॑ विश्व॒ऽपुष॑म्। र॒यिम्। अ॒ना॒गा॒स्त्वमित्य॑नागः॒ऽत्वम्। नः॒। अदि॑तिः। कृ॒णो॒तु॒। क्ष॒त्रम्। नः॒। अश्वः॑। व॒न॒ता॒म्। ह॒विष्मा॑न् ॥४५ ॥

Mantra without Swara
सुगव्यन्नो वाजी स्वश्व्यम्पुँसः पुत्राँऽउत विश्वापुषँ रयिम्ऽअनागास्त्वन्नोऽअदितिः कृणोतु क्षत्रन्नोऽअश्वो वनताँ हविष्मान् ॥

सुगव्यमिति सुऽगव्यम्। नः। वाजी। स्वश्व्यमिति सुऽअश्व्यम्। पुंसः। पुत्रान्। उत। विश्वापुषम्। विश्वुपुषमिति विश्वऽपुषम्। रयिम्। अनागास्त्वमित्यनागःऽत्वम्। नः। अदितिः। कृणोतु। क्षत्रम्। नः। अश्वः। वनताम्। हविष्मान्॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में आचार्य को (वाजी) = ज्ञानी, शक्तिशाली व क्रियाशील कहा है। यह (वाजी) = ज्ञानी व शक्तिसम्पन्न आचार्य जोकि (अदिति:) = हमारा खण्डन न होने देनेवाला है, वह उत्तम ज्ञान देकर (नः) = हमारी (सुगव्यम्) = [गाव ज्ञानेन्द्रियाणि] ज्ञानेन्द्रियों की उत्तमता को, (स्वश्व्यम्) = [अश्वाः कर्मेन्द्रियाणि] कर्मेन्द्रियों की उत्तमता को, (पुंसः पुत्रान्) = पुरुषार्थ साधक पुरुषों व पुत्रों को वीरता के द्वारा अपनी पवित्रता को सिद्ध करनेवाले पुत्रों को (उत) = और (विश्वापुषम् रयिम्) = सबका पोषण करनेवाले धन को, जिस धन के द्वारा हम केवल अपना ही पोषण न करके औरों का भी पोषण करते हैं और, (अनागास्त्वम्) = [अनागस्त्वम्-म० ] निष्पापता को कृणोतु करे। आचार्य की कृपा से हम 'उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाले, उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाले, वीर पुत्रोंवाले, सबका पोषण करनेवाले धन से युक्त और अतएव निष्पाप जीवनवाले' बनें। २. (अश्वः) = सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाला, (हविष्मान्) = सदा दानपूर्वक अदन की वृत्तिवाला यह आचार्य (नः) = हमारे लिए (क्षत्रम्) क्षत से त्राण करनेवाले बल को (वनताम्) = प्राप्त कराए [वनताम् करोतु - उ० ] । ३. इस प्रकार सुन्दर जीवन बितानेवाला ही ४४वें मन्त्र के अनुसार हर्षपूर्वक शरीर को छोड़ पाता है। उसका यह जीवन तो सुन्दर बीतता ही है, उसे अगला लोक भी उत्तम प्राप्त होता है। एवं आचार्य का दिया हुआ ज्ञान इसकी इहलौकिक व पारलौकिक उभयविध उन्नति का कारण बनता है।
Essence
भावार्थ- आचार्य 'वाजी, अदितिः, अश्व व हविष्मान्' होता है तो वह विद्यार्थी को सुगव्य, स्वश्व्य, वीरतायुक्त, सर्वपोषक धन, निष्पापता व क्षत्र-बल' को प्राप्त करानेवाला 'बनता है।
Subject
इहलोक का उत्कर्ष