Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 42

39 Mantra
25/42
Devata- यजमानो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
एक॒स्त्वष्टु॒रश्व॑स्या विश॒स्ता द्वा य॒न्तारा॑ भवत॒स्तथ॑ऽऋ॒तुः।या ते॒ गात्रा॑णामृतु॒था कृ॒णोमि॒ ताता॒ पिण्डा॑नां॒ प्र जु॑होम्य॒ग्नौ॥४२॥

एकः॑। त्वष्टुः॑। अश्व॑स्य। वि॒श॒स्तेति॑ विऽश॒स्ता। द्वा। य॒न्तारा॑। भ॒व॒तः॒। तथा॑। ऋ॒तुः। या। ते॒। गात्रा॑णाम्। ऋ॒तु॒थेत्यृ॑तु॒ऽथा। कृ॒णोमि॑। तातेति॒ ताता॑। पिण्डा॑नाम्। प्र। जु॒हो॒मि॒। अ॒ग्नौ ॥४२ ॥

Mantra without Swara
एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथऽऋतुः । या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानाम्प्र जुहोम्यग्नौ ॥

एकः। त्वष्टुः। अश्वस्य। विशस्तेति विऽशस्ता। द्वा। यन्तारा। भवतः। तथा। ऋतुः। या। ते। गात्राणाम्। ऋतुथेत्यृतुऽथा। कृणोमि। तातेति ताता। पिण्डानाम्। प्र। जुहोमि। अग्नौ॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के प्रकरण को ही चलाते हुए कहते हैं कि (एक:) = जीवन-निर्माण के कार्य में मुख्य भाग लेनेवाला [एके मुख्यान्यकेवलाः] आचार्य (त्वष्टुः) = [त्विष दीप्तौ] बुद्धि के दृष्टिकोण से सूर्य के समान [त्वष्टा - सूर्य] चमकनेवाले तथा (अश्वस्य) = शरीर में घोड़े के समान शक्तिवाले विद्यार्थी का (विशस्ता) = विशेषरूप से दोषों का छेदन करनेवाला होता है। २. (द्वा यन्तारा भवतः) = दो ही बातें निर्माण कार्य में नियामक होती हैं। आचार्य की सभी क्रियाएँ इन दो दृष्टिकोणों को लिये हुए होती हैं- [क] विद्यार्थी का मस्तिष्क (त्वष्टा) = सूर्य के समान देदीप्यमान बने और उसका शरीर (अश्व) = घोड़े के समान शक्तिशाली हो। ३. दो नियामक तत्त्वों के साथ तथा उसी प्रकार (ऋतुः) = ऋतु भी नियामक होती है। स्पष्ट है गर्मी का कार्यक्रम वर्षाऋतु में कुछ परिवर्तित हो जाएगा और वर्षा में चलनेवाले कार्य को सर्दी में कुछ परिवर्तन करना होगा। पढ़ाई के समय में ऋतु परिवर्तन के साथ परिपाक करना ही पड़ेगा। वास्तव में ऋतु के अनुसार की गई सब क्रियाएँ विद्यार्थी को नीरोग व निर्दोष बनानेवाली होंगी। आचार्य विद्यार्थी से कहता है कि-४. (या) = जो मैं तेरे (गात्राणाम्) = अंगों के दोषों को (ऋतुथा) = ऋतु के अनुसार (कृणोमि) = दूर करने का प्रयत्न करता हूँ अथवा ऋतु के अनुसार अंगों के संस्कार का प्रयत्न करता हूँ तो अग्नौ प्रगतिशील तुझे (ता-ता) = उन-उन (पिण्डानाम्) = बलों को [पिण्ड - might, strength, power] (प्रजुहोमि) = आहुत करता हूँ। इन्हें निर्दोष बनाने के लिए किये गये संस्कारों द्वारा तुझे प्रत्येक अंग में सशक्त करता हूँ। ५. वस्तुत: आचार्य का यज्ञ यही है कि वह विद्यारूप अग्नि में अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्तिरूप हव्य की आहुति दे, विद्यार्थी को सर्वांग सुन्दर बनाने का प्रयत्न करे।
Essence
भावार्थ- आचार्य ने विद्यार्थी को 'त्वष्टा व अश्व' दीप्त व सबल बनाना है। इसके लिए वह ऋतुओं के अनुसार सब क्रियाओं को करता हुआ विद्यार्थीरूप अग्नि में बलों की आहुति देता है, अर्थात् उन्हें सर्वाङ्ग सबल बनाने का प्रयत्न करता है।
Subject
त्वष्टा- अश्व