Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 35

39 Mantra
25/35
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- स्वराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये वा॒जिनं॑ परि॒पश्य॑न्ति प॒क्वं यऽई॑मा॒हुः सु॑र॒भिर्निर्ह॒रेति॑।ये चार्व॑तो मासभि॒क्षामु॒पास॑तऽउ॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्त्तिर्नऽइन्वतु॥३५॥

ये। वा॒जिन॑म्। प॒रि॒पश्य॒न्तीति॑ परि॒ऽपश्य॑न्ति। प॒क्वम्। ये। ई॒म्। आ॒हुः। सु॒र॒भिः। निः। ह॒र॒। इति॑। ये। च॒। अर्व॑तः। मा॒स॒ऽभि॒क्षामिति॑ मांꣳसऽभिक्षाम्। उ॒पास॑त॒ इत्यु॑प॒ऽआस॑ते। उ॒तो इत्यु॒तो। तेषा॑म्। अ॒भिगू॑र्त्ति॒रित्य॒भिऽगू॑र्त्तिः। नः॒। इ॒न्व॒तु॒ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
ये वाजिनम्परिपश्यन्ति पक्वँय ईमाहुः सुरभिर्निर्हरेति । ये चार्वतो माँसभिक्षामुपासतऽउतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु ॥

ये। वाजिनम्। परिपश्यन्तीति परिऽपश्यन्ति। पक्वम्। ये। ईम्। आहुः। सुरभिः। निः। हर। इति। ये। च। अर्वतः। मासऽभिक्षामिति मांꣳसऽभिक्षाम्। उपासत इत्युपऽआसते। उतो इत्युतो। तेषाम्। अभिगूर्त्तिरित्यभिऽगूर्त्तिः। नः। इन्वतु॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में वीर्यरक्षा के महत्त्व का प्रतिपादन है। आचार्य गुरुकुलों में विद्यार्थी के वातावरण को सुन्दर बनाकर उसे वीर्यरक्षा के योग्य बनाते हैं। इसी वीर्यरक्षण के द्वारा वे उसके शरीर को शक्तिशाली व मस्तिष्क को परिपक्व ज्ञानवाला बनाते हैं। इसी के द्वारा वे उसके जीवन को दिव्य गुणों की सुगन्धि से परिपूर्ण करते हैं और उसके बाद उसे यही आदेश देते हैं कि तू इस ज्ञान को निश्चय से दूर-दूर तक फैलानेवाला बन। आचार्य कहते हैं कि काम-क्रोधादि का संहार करनेवाले तुझसे हम तेरे जीवन की ही भिक्षा माँगते हैं 'तू अपने मांस को इस लोक के कल्याण के लिए दे डाल ' । मन्त्र में कहते हैं कि २. (ये) = जो आचार्य विद्यार्थी को (वाजिनम्) = शक्तिशाली व सुदृढ़ शरीरवाला तथा (पक्वम्) = परिपक्व ज्ञानवाला, परिपक्व बुद्धिवाला (परिपश्यन्ति) = देखते हैं तथा ३. (ये) = जो (ईम्) = निश्चय से (आहुः) = कहते हैं कि तू (सुरभिः) = [क] स्वास्थ्य के कारण चमकते हुए [Shining, Handsome] सुन्दर शरीरवाला है [ख] दीप्त ज्ञानाग्नि के कारण उत्तम बुद्धिमान् [Wise. Learned] हुआ है [ग] मन में उत्तम गुणोंवाला [Good, Virtuous ] बना है। ऐसा तू (निर्हरः इति) = ' निश्चय से ज्ञान को दूर-दूर तक ले जानेवाला बन' हम तो बस यही चाहते हैं । ४. (ये च) = और जो आचार्य (चार्वतः) = काम-क्रोधादि का संहार करनेवाला विद्यार्थी से (मांसभिक्षाम्) = उसके मांस [जीवन] की भिक्षा उपासते माँग लेते हैं, अर्थात् जो उसे यह कहते हैं कि तू लोकहित के लिए अपना जीवन दे डाल, तेषाम् उन, अपने लिए कुछ भी न चाहनेवाले आचार्यों का (अभिगूर्त्तिः) = उद्योग (उत) = निश्यच से (नः इन्वतु) = हमें प्राप्त करे, अर्थात् हम भी आचार्यों में से एक बनें और विद्यार्थी को सुन्दर जीवनवाला व इन्हीं परिपक्व ज्ञानवाला बनाकर उससे लोकहित करने की गुरुदक्षिणा लें।
Essence
भावार्थ - आचार्य का कर्तव्य है कि [क] विद्यार्थी को दृढ़ शरीरवाला बनाये [वाजिनम्] [ख] उसके ज्ञान को परिपक्व करे [पक्वम्], [ग] उसको सुरभि बनाये - सुन्दर शरीरवाला, बुद्धिमान् व दिव्य गुणसम्पन्न करे। [घ] उसे इस ज्ञान को दूर-दूर तक फैलाने का निर्देश करे [निर्हर : इति], [ङ] लोकहित के लिए जीवन को खपा देने की प्रेरणा करे इसी को अपनी गुरुदक्षिणा समझे [मांसभिक्षामुपासते ] ।
Subject
आचार्य कर्त्तव्य