Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 32

39 Mantra
25/32
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदश्व॑स्य क्र॒विषो॒ मक्षि॒काश॒ यद्वा॒ स्वरौ॒ स्वधि॑तौ रि॒प्तमस्ति॑।यद्धस्त॑योः शमि॒तुर्यन्न॒खेषु॒ सर्वा॒ ता ते॒ऽअपि॑ दे॒वेष्व॑स्तु॥३२॥

यत्। अश्व॑स्य। क्र॒विषः॑। मक्षि॑का। आश॑। यत्। वा॒। स्वरौ॑। स्वधि॑ता॒विति॒ स्वऽधि॑तौ। रि॒प्तम्। अस्ति॑। यत्। हस्त॑योः। श॒मि॒तुः। यत्। न॒खेषु॑। सर्वा॑। ता। ते॒। अपि॑। दे॒वेषु॑। अ॒स्तु॒ ॥३२ ॥

Mantra without Swara
यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति । यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता तेऽअपि देवेष्वस्तु ॥

यत्। अश्वस्य। क्रविषः। मक्षिका। आश। यत्। वा। स्वरौ। स्वधिताविति स्वऽधितौ। रिप्तम्। अस्ति। यत्। हस्तयोः। शमितुः। यत्। नखेषु। सर्वा। ता। ते। अपि। देवेषु। अस्तु॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यत्) = जो (अश्वस्य) = सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाले का तथा (क्रविषः) = [कृवि हिंसाकरणयोश्च] निरन्तर क्रिया के द्वारा बुराई का संहार करनेवाले का (मक्षिका) = [मक्षति= accumulate, to collect ] जीविकार्थ धनोपार्जन (आश) = समय को खा लेता है, इसका बहुत-सा समय धनोपार्जन में ही व्यतीत हो जाता है। (यद्वा) = और जो (स्वरौ) = [स्वृ शब्दे ] शब्दरूप वाङ्मय, अर्थात् ज्ञान में (रिप्तम्) = [लिप्तं ] इसे लगाव है तथा (स्वधितौ) = सबके आत्मतत्त्व के धारण में इसे लगाव है। २. (यत्) = जो (हस्तयोः) = [कर्मणे हस्तौ विसृष्टौ ] हाथों में इसे लगाव है, अर्थात् हाथों से कोई-न-कोई कार्य करता ही रहता है, अपने मुख्य कार्य के बाद आमोद-प्रमोद के रूप में किसी-न-किसी व्यासंग [Hobby] को अपनाये रखता है और इस प्रकार पूर्णत: सब दोषों को शान्त करनेवाले इस व्यक्ति का (यत्) = जो (न) = नहीं (खेषु) = छिद्रों में, दोषों में लगाव है, अर्थात् यह जो सब व्यसनों से ऊपर उठा रहना है, ३. (ते) = तेरी (सर्वा ता) = ये सब बातें (अपि) = भी (देवेष्वस्तु) = [सन्तु] देवोपयोगी हों, दिव्य गुणों की उत्पत्ति का कारण बनें।
Essence
भावार्थ - प्रस्तुत मन्त्र में दिव्य गुणों की उत्पत्ति के लिए निम्न बातें कही गई हैं - १. सद्गृहस्थ सर्वप्रथम तो गृहस्थ के सञ्चालन के लिए धनोपार्जन के कार्य में लगे। धनोपार्जन मक्षिक के रसग्रहण की भाँति करना है। लाटरी से एक ही रात में धनी बनने का स्वप्न नहीं लेना। २. धनोपार्जन से वाङ्मय की उपासना करनी है। ३. मस्तिष्क के थकने पर आत्मचिन्तन द्वारा हृदय में आत्मतत्त्व के स्थापन का प्रयत्न करना है ४. आमोद-प्रमोद के लिए हाथ के किसी व्यासंग को अपनाना है । ५. शान्त स्वभाववाला बनकर प्रयत्न करना है कि व्यसनों की ओर झुकाव न हो जाए [न+ख ] ।
Subject
कर्म में लगे रहना