Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 29

39 Mantra
25/29
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यू॒प॒व्र॒स्काऽउ॒त ये यू॑पवा॒हाश्च॒षालं॒ येऽअ॑श्वयू॒पाय॒ तक्ष॑ति। ये चार्व॑ते॒ पच॑नꣳ स॒म्भर॑न्त्यु॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्त्तिर्नऽइन्वतु॥२९॥

यू॒प॒व्र॒स्का ति॑ यूपऽव्र॒स्काः। उ॒त। ये। यू॒प॒वा॒हा इति॑ यूपऽवा॒हाः। च॒षाल॑म्। ये। अ॒श्व॒यू॒पायेति॑ अश्वऽयू॒पाय॑। तक्ष॑ति। ये। च॒। अर्व॑ते। पच॑नम्। स॒म्भर॒न्तीति॑ स॒म्ऽभर॑न्ति। उ॒तोऽइत्यु॒तो। तेषा॑म्। अ॒भिगू॑र्त्ति॒रित्य॒भिऽगू॑र्त्तिः। नः॒। इ॒न्व॒तु॒ ॥२९ ॥

Mantra without Swara
यूपव्रस्काऽउत ये यूपवाहाश्चषालँयेऽअश्वयूपाय तक्षति । ये चार्वते पचनँ सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु ॥

यूपव्रस्का ति यूपऽव्रस्काः। उत। ये। यूपवाहा इति यूपऽवाहाः। चषालम्। ये। अश्वयूपायेति अश्वऽयूपाय। तक्षति। ये। च। अर्वते। पचनम्। सम्भरन्तीति सम्ऽभरन्ति। उतोऽइत्युतो। तेषाम्। अभिगूर्त्तिरित्यभिऽगूर्त्तिः। नः। इन्वतु॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में जीवन को यज्ञमय बनाने का उल्लेख है। उस 'जीवन-यज्ञ' की यज्ञशाला यह शरीर है। इस शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग उस यज्ञशाला के यूप हैं। इन यूपोंयज्ञस्तम्भों का ठीक होना अत्यन्त आवश्यक है, अतः मन्त्र में कहते हैं कि (यूपव्रस्का:) = [यूपं वृश्चन्ति] जो इस अङ्गरूप यज्ञस्तम्भों का वृश्चन द्वारा ठीक निर्माण करनेवाले बढ़ई हैं। इस यज्ञस्तम्भों पर चढ़ी हुई चर्बीरूप मैल की तहों को छील-छालके जो इन स्तम्भों को ठीक-ठाक बना देते हैं, (उत) = और (ये) = जो (यूपवाहा:) = इन यज्ञस्तम्भों का वहन करनेवाले हैं, अर्थात् इन अङ्गरूप स्तम्भों को कार्यों में प्रयुक्त करनेवाले हैं, (ये) = जो (अश्वयूपाय) = कर्मों में व्याप्त रहनेवाले जीव के इन यज्ञस्तम्भों के लिए (चषालम्) = [यूपाग्रामाग्रेस्थाप्यं काष्ठं] अङ्गरूपस्तम्भों के अग्रभाग में स्थाप्य मस्तिष्करूप चषाल को भी [तक्ष तनूकरणे] खूब सूक्ष्म व तीव्र बनाते हैं। २. (ये च) = और जो (अर्वते) = [हिंसायाम्] काम-क्रोधादि पशुओं की हिंसा करनेवाले के लिए इसलिए कि वह कामादि का हिंसक बन सके (पचनं सम्भरन्ति) = पचन को, बुद्धि के परिपाक को सम्यक् प्राप्त कराते हैं, (ते) इन लोगों का (अभिगूर्त्तिः) = उद्योग (नः इन्वतु) = हमें भी प्रीणित करनेवाला हो, अर्थात् हम भी बड़ी रुचि से ज्ञान का परिपाक करने में लगे रहें। ३. इस प्रकार मन्त्र में निम्न बातें स्पष्ट हैं- [क] हम अङ्ग-प्रत्यङ्ग को शरीररूप यज्ञशाला का स्तम्भ समझें। इन अङ्गों को चर्बी की तहों से बेडौल न होने दें। उचित व्यायाम व आसनों से उस चर्बी का तक्षण करते रहें। [ख] इन अङ्गों को सदा क्रियाशील बनाये रक्खें। अङ्ग शब्द का तो धात्वीय अर्थ ही 'गतिशील' है। अङ्गरूप साम्य शरीररूप यज्ञशाला का वहन करनेवाला हो। [ग] इन यूपों के अग्रभाग में स्थाप्य काष्ठचषाल यह मस्तिष्क है, इसका सुन्दर तक्षण अत्यन्त आवश्यक है। जितनी बुद्धि सूक्ष्म होगी उतना ही यह तत्त्वदर्शन ठीक कर सकेगी [चषालं तक्षति] [घ] इस यज्ञशाला में कामादि पशुओं का बन्धन हो सके उसके लिए आवश्यक है कि ज्ञान का उत्तम परिपाक हो । ज्ञान के परिपाक के न होने पर मनुष्य (अर्वा:) = कामादि का संहार करनेवाला नहीं बन सकता । [ अर्वते पचनं सम्भरन्ति ] ।
Essence
भावार्थ- १. हम अङ्गरूप स्तम्भों का ठीक वृश्चन कर उन्हें सुन्दर, सुडौल बनाएँ । २. इन अङ्गरूप स्तम्भों को संभृत किये रखने के स्थान में इन्हें कार्य - विनियुक्त करें । ३. मस्तिष्क को तीव्र बनाएँ। ४. ज्ञान का परिपूर्ण पाक करने का प्रयत्न करें।
Subject
यूपव्रश्चन