Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 28

39 Mantra
25/28
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
होता॑ध्व॒र्युराव॑याऽअग्निमि॒न्धो ग्रा॑वग्रा॒भऽउ॒त शस्ता॒ सुवि॑प्रः। तेन॑ य॒ज्ञेन॒ स्वरङ्कृतेन॒ स्विष्टेन व॒क्षणा॒ऽआ पृ॑णध्वम्॥२८॥

होता॑ अ॒ध्व॒र्युः। आव॑या॒ इत्याऽव॑याः। अ॒ग्नि॒मि॒न्ध इत्या॑ग्निम्ऽइ॒न्धः। ग्रा॒व॒ग्रा॒भ इति॑ ग्रावऽग्रा॒भः। उ॒त। शस्ता॑। सुवि॑प्र॒ इति॑ सुऽवि॑प्रः। तेन॑। य॒ज्ञेन॑। स्व॑रङ्कृते॒नेति॒ सुऽअ॑रङ्कृतेन। स्वि᳖ष्टे॒नेति॒ सुऽइ॑ष्टेन। व॒क्षणाः॑। आ। पृ॒ण॒ध्व॒म् ॥२८ ॥

Mantra without Swara
होताध्वर्युरावयाऽअग्निमिन्धो ग्रावग्राभऽउत शँस्ता सुविप्रः । तेन यज्ञेन स्वरङ्तेन स्विष्टेन वक्षणाऽआ पृणध्वम् ॥

होता अध्वर्युः। आवया इत्याऽवयाः। अग्निमिन्ध इत्याग्निम्ऽइन्धः। ग्रावग्राभ इति ग्रावऽग्राभः। उत। शस्ता। सुविप्र इति सुऽविप्रः। तेन। यज्ञेन। स्वरङ्कृतेनेति सुऽअरङ्कृतेन। स्विष्टेनेति सुऽइष्टेन। वक्षणाः। आ। पृणध्वम्॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में 'प्रभु ने यज्ञ को प्राप्त कराया' ऐसा कहा था। प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु कहते हैं कि हे दिव्य वृत्तिवाले पुरुषो! तेन उस स्वरङ्कृतेन साधु अलंकृत, अर्थात् बड़ी उत्तमता से तथा स्विष्टेन उत्तम भावना से किये गये (यज्ञेन) = यज्ञ से तुम (वक्षणा:) = अपनी सब प्रकार की उन्नतियों को अथवा आशा-नदियों को (आपृणध्वम्) = पूर्ण करनेवाले बनो, अर्थात् इस यज्ञरूप उत्तम कर्म को जब तुम उत्तम भावना से व उत्तम प्रकार से करोगे तो तुम्हारी सब इच्छाएँ पूर्ण हो पाएँगी - तुम्हारी सर्वतोमुखी उन्नति हो सकेगी। २. 'तुम कैसे बनो' इस विषय में भी प्रभु सात नामों का उच्चारण करते हुए सात बातें कहते हैं [क] (होता) = तुम दानपूर्वक अदनवाले बनो, सदा यज्ञशेष का सेवन करनेवाले होओ। [ख] (अध्वर्युः) = अहिंसात्मक कार्यों को अपने साथ जोड़नेवाले होओ, कभी हिंसा में तुम्हारी प्रवृत्ति न हो। [ग] (अवया:) = [कण अवयजने] तुम दुर्गुणों को अपने से सर्वथा दूर करनेवाले बनो। [घ] (अग्निमिन्ध:) = ज्ञानाग्नि को अपने अन्दर दीप्त करने के लिए प्रयत्नशील होओ। [ङ] (ग्रावग्राभ:) = प्रभु-स्तवन का ग्रहण करनेवाले बनो, [च] (शस्ता) = उत्तम कार्यों का शंसन करनेवाले होवो उत और [छ] (सुविप्रः) = शोभन मेधावी बनो। प्रयत्न करो कि तुम्हारा ज्ञान अधिक-से-अधिक हो। इस प्रकार इन सात बातों को अपने जीवन में अनूदित करके तुम जीवनरूप सप्तहोताओंवाले यज्ञ को सुन्दरता से चलानेवाले बनो ।
Essence
भावार्थ- जीवन को सप्तहोताओं से चलनेवाला यज्ञ बनाओ। यज्ञ को उत्तम भावना से व उत्तम प्रकार से करते हुए तुम अपनी सब उन्नतियों को सिद्ध करो।
Subject
सप्तहोता यज्ञ