Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 19

39 Mantra
25/19
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- स्वराड् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स्व॒स्ति न॒ऽइन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः।स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ऽअरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु॥१९॥

स्व॒स्ति। नः॒। इन्द्रः॑। वृ॒द्धश्र॑वा॒ इति॑ वृ॒द्धऽश्र॑वाः। स्व॒स्ति। नः॒। पू॒षा। वि॒श्ववेदा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः। स्व॒स्ति। नः॒। तार्क्ष्यः॑। अरि॑ष्टनेमि॒रित्यरि॑ष्टऽनेमिः। स्व॒स्ति। नः॒। बृह॒स्पतिः॑। द॒धा॒तु॒ ॥१९ ॥

Mantra without Swara
स्वस्ति नऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्या अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

स्वस्ति। नः। इन्द्रः। वृद्धश्रवा इति वृद्धऽश्रवाः। स्वस्ति। नः। पूषा। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः। स्वस्ति। नः। तार्क्ष्यः। अरिष्टनेमिरित्यरिष्टऽनेमिः। स्वस्ति। नः। बृहस्पतिः। दधातु॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (नः) = हमारे लिए (वृद्धश्रवाः) = सदा से बढ़े हुए ज्ञानवाला (इन्द्रः) = बलवान् व सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु (स्वस्ति) = कल्याण करनेवाला हो, अर्थात् प्रभु की कृपा से हमारा ज्ञान बढ़े और उस प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में सब वासनाओं का दहन होकर हमें वास्तविक शान्ति का लाभ हो और हमारी जीवन स्थिति उत्तम हो । २. (नः) = हमारे लिए (विश्ववेदाः) = सम्पूर्ण धनों का स्वामी (पूषा) = सबका पोषण करनेवाला प्रभु पोषण के लिए आवश्यक धनों को प्राप्त कराता हुआ (स्वस्ति) = कल्याणकर हो, अर्थात् प्रभुकृपा से हम पुरुषार्थ करते हुए आवश्यक धनों की प्राप्ति के द्वारा जीवन की स्थिति को उत्तम कर सकें । ३. (नः) = हमारे लिये (तार्क्ष्य:) = [तृक्ष गतौ ] गति में उत्तम = स्वाभाविक क्रियावाला पूर्णरूप से निःस्वार्थ क्रियावाला, (अरिष्टनेमिः) = अहिंसित मर्यादावाला प्रभु (स्वस्ति) = कल्याणकर हो। हम भी उस प्रभु की तरह सतत व निःस्वार्थ गतिवाले बनकर सदा मर्यादा में चलते हुए कभी हिंसित न हों और इस मर्यादित जीवन में कल्याण प्राप्त करें। ४. (नः) = हमारे लिए (बृहस्पतिः) = बृहत् [बड़े] आकाशादि का पति वह प्रभु (स्वस्ति) = कल्याण को (दधातु) = धारण करे। हम भी 'बृहस्पति' प्रभु की उपासना करते हुए 'बृहस्पति' बनें, उदार हृदयाकाशवाले बनें। यह उदारता हमें कृपण [ miser] की कृपणता [misery] से ऊपर उठाकर कल्याणमय स्थिति में प्राप्त कराए।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु की उपासना करते हुए [क] वृद्ध ज्ञानवाले व काम-क्रोधादि शत्रुओं का संहार करनेवाले बनें, [ख] पोषण के लिए आवश्यक धन प्राप्त करें, [ग] निरन्तर क्रियाशील जीवन बिताते हुए कभी मर्यादा का उल्लंघन न करें। [घ] उदारहृदय बनकर कल्याण को सिद्ध करें।
Subject
स्वस्ति का साधन