Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 8

65 Mantra
23/8
Devata- वाय्वादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
व॑सवस्त्वाञ्जन्तु गाय॒त्रेण॒ छन्द॑सा रु॒द्रास्त्वा॑ञ्जन्तु॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑सादि॒त्यास्त्वा॑ञ्जन्तु॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑सा। भूर्भुवः॒ स्वर्लाजी३ञ्छाची३न्यव्ये॒ गव्य॑ऽए॒तदन्न॑मत्त देवाऽए॒तदन्न॑मद्धि प्रजापते॥८॥

वस॑वः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। रु॒द्राः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। आ॒दि॒त्याः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। भूः। भुवः॑। स्वः॑। लाजी३न्। शाची३न्। यव्ये॑। गव्ये॑। ए॒तत्। अन्न॑म्। अ॒त्त॒। दे॒वाः॒। ए॒तत्। अन्न॑म्। अ॒द्धि॒। प्र॒जा॒प॒त॒ इति॑ प्रजाऽपते ॥८ ॥

Mantra without Swara
वसवस्त्वाञ्जन्तु गायत्रेण च्छन्दसा रुद्रास्त्वाञ्जन्तु त्रैष्टुभेन च्छन्दसाऽआदित्यास्त्वाञ्जन्तु जागतेन च्छन्दसा । भूर्भुवः स्वर्लाजी३ञ्छाची३न्यव्ये गव्यऽएतदन्नमत्त देवाऽएतदन्नमद्धि प्रजापते ॥

वसवः। त्वा। अञ्जन्तु। गायत्रेण। छन्दसा। रुद्राः। त्वा। अञ्जन्तु। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। आदित्याः। त्वा। अञ्जन्तु। जागतेन। छन्दसा। भूः। भुवः। स्वः। लाजी३न्। शाची३न्। यव्ये। गव्ये। एतत्। अन्नम्। अत्त। देवाः। एतत्। अन्नम्। अद्धि। प्रजापत इति प्रजाऽपते॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (वसवः) = वसुनामक आठ देव अथवा शरीर में उत्तम निवास के लिए आवश्यक तत्त्व (त्वा) = तुझे (गायत्रेण छन्दसा:) = [ गयाः प्राणाः तन् तत्रे] प्राणशक्ति के रक्षण की प्रबल इच्छा से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। साधक की सर्वप्रथम कामना यही होनी चाहिए कि उसकी प्राणशक्ति ठीक रहे । २. (रुद्राः) = रुद्र अथवा 'रोरूयमानो द्रवति' जो प्रभु के नाम का निरन्तर उच्चारण करता हुआ गतिशील होता है, वही तो रुद्र है। ये प्रभुस्मरणपूर्वक कर्त्तव्य को करने की भावनाएँ (त्वा) = तुझे (त्रैष्टुभेन छन्दसा) = [त्रि + स्तुप्] काम, क्रोध व लोभ तीनों को रोकने की प्रबल कामना से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। मनुष्य प्रभुस्मरण करता है, कार्य में लगा रहता है। बस, यह बात उसे कामादि से दूर रखती है। यह व्यक्ति काम, क्रोध व लोभ का शिकार नहीं होता। ३. (आदित्याः) = बारह आदित्य अथवा सब जगह से अच्छाई के ग्रहण करने की वृत्ति (त्वा) = तुझे (जागतेन छन्दसा) = लोकहित करने की प्रबल भावना से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। लोकहित वही कर सकता है जो सब जगह से अच्छाई को ग्रहण की वृत्तिवाला बने । ४. 'गायत्र छन्द से' तू (भूः) = पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त करनेवाला होगा, 'त्रैष्टुभ् छन्द से' तू (भुवः) = आकलन, चिन्तन व ज्ञानवाला बनेगा। कामादि ही तो ज्ञान का आवरण बने रहते हैं। 'जागत छन्द से' तू (स्वः) = पूर्ण सुख को प्राप्त करनेवाला होगा । ५. (लाजीन्) = [योऽयं लाजानां समूहो लाजीनित्युक्तः - उ० ] लाजाओं को (शाचीन्) = [योऽयं सक्तूनां समूहः शाचीनित्युक्तः - उ० ] सत्तुओं को (यव्ये) = [ यवमय: समूह: - उ० ] यवसमूह में अथवा (गव्ये) = [गव्येर्विकारे दध्यादि - उ० ] दही आदि में (एतद् अन्नं अत्त) = इस अन्न को खाओ। (देवाः) = देव इसी अन्न को खाते हैं। वस्तुतः यही 'धान, सत्तु, जौ व दही' आदि पदार्थ ही मनुष्य को सात्त्विक वृत्तिवाला व देव बनाते हैं। हे (प्रजापते) = प्रजा के रक्षक! तू भी (एतत् अन्नं अद्धि) = इसी अन्न को खा । इस अन्न का सेवन तुझे सात्त्विक वृत्तिवाला बनाकर प्रजा का रक्षक बनाएगा, मांसाहारी राजा तो प्रजा का भक्षक ही बन जाएगा।
Essence
भावार्थ- हममें 'प्रजारक्षण, काम कोध-लोभ-निवारण व लोकहित' की प्रबल कामना हो। इससे हम स्वस्थ, सज्ञान व सुखी बनेंगे। हम 'धान, सत्तु, जौ व दही' आदि पदार्थों का प्रयोग करें।
Subject
अञ्जन [Decoration ]