Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 7

65 Mantra
23/7
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यद्वातो॑ऽअ॒पोऽअग॑नीगन्प्रि॒यामिन्द्र॑स्य त॒न्वम्। ए॒तस्तो॑तर॒नेन॑ प॒था पुन॒रश्व॒माव॑र्त्तयासि नः॥७॥

यत्। वातः॑। अ॒पः। अग॑नीगन्। प्रि॒याम्। इन्द्र॑स्य। त॒न्व᳖म्। ए॒तम्। स्तो॒तः॒। अ॒नेन॑। प॒था। पुनः॑। अश्व॑म्। आ। व॒र्त्त॒या॒सि॒। नः॒ ॥७ ॥

Mantra without Swara
यद्वातोऽअपोऽअगनीगन्प्रियामिन्द्रस्य तन्वम् । एतँ स्तोतरनेन पथा पुनरश्वमा वर्तयासि नः ॥

यत्। वातः। अपः। अगनीगन्। प्रियाम्। इन्द्रस्य। तन्वम्। एतम्। स्तोतः। अनेन। पथा। पुनः। अश्वम्। आ। वर्त्तयासि। नः॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. इन्द्रियरूप घोड़े विषयों में जा भटकते हैं, उनको न भटकने देने के लिए आवश्यक है-(यत्) = कि (वातः) = [वा गतौ = अत् गतौ] आत्मा (अपः) = कर्मों को अगनीगन्= प्राप्त हो । अत सातत्यागमने' धातु से आत्मा शब्द बनता है और 'वा गतौ' से 'वातः' । एवं, वातः व आत्मा पर्याय हैं। ('वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तः शरीरम्') = में शरीर के प्रतिकूल 'वायुः ' आत्मा का ही वाचक है। २. इस कर्मशीलता के द्वारा (यत्) = जब यह (इन्द्रस्य) = इन्द्र के, परमैश्वर्यशाली प्रभु के (प्रियां तन्वम्) = प्रिय शरीर को प्राप्त करता है, अर्थात् कर्मशीलता के द्वारा शरीर को इस प्रकार स्वस्थ व तेजस्वी बनाता है कि यह शरीर प्रभु का प्रिय होता है । ३. हे (स्तोतः) = प्रभु के उपासक (नः एतं अश्वम्) = हमारे इस इन्द्रियरूप घोड़े को (अनेन पथा) = इस कर्मशीलता के मार्गों से (पुन:) = फिर (नः आवर्त्तयासि) = विषयों से व्यावृत्त करके हमारी ओर लानेवाला बन, इन्द्रियाश्व प्रभु की ओर चलनेवाले तभी होते हैं जब विषयों के बन्धनों से बद्ध नहीं होते। इनको विषयों से प्रत्यावृत्त व प्रत्याहृत करके ही हम आत्मतत्त्व का दर्शन किया करते हैं। उपनिषद् के शब्दों में- ('कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्त्वमिच्छन्') = कोई एक-आध ही ऐसा धीर पुरुष होता है जो आवृत्त चक्षु होकर अन्तःस्थित आत्मतत्त्व को देखता है।
Essence
भावार्थ- जीवात्मा वात-वायु क्रियाशील है। क्रियाशीलता से यह अपने इस शरीर को प्रभु का प्रिय बनाये रखता है। इस क्रियाशीलता के मार्ग से हमें इन्द्रियाश्वों को विषयों से व्यावृत्त करके आत्मतत्त्व का दर्शन करना चाहिए।
Subject
अभ्यावर्तन