Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 62

65 Mantra
23/62
Devata- समाधाता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒यं वेदिः॒ परो॒ऽअन्तः॑ पृथि॒व्याऽअ॒यं य॒ज्ञो भुव॑नस्य॒ नाभिः॑।अ॒यꣳ सोमो॒ वृष्णो॒ऽअश्व॑स्य॒ रेतो॑ ब्र॒ह्मायं वा॒चः प॑र॒मं व्यो॑म॥६२॥

इ॒यम्। वेदिः॑। परः॑। अन्तः॑। पृ॒थि॒व्याः। अ॒यम्। य॒ज्ञः। भुव॑नस्य। नाभिः॑। अ॒यम्। सोमः॑। वृष्णः॑। अश्व॑स्य। रेतः॑। ब्र॒ह्मा। अ॒यम्। वा॒चः। प॒र॒मम्। व्यो॒मेति॒ विऽओ॑म ॥६२ ॥

Mantra without Swara
इयँवेदिः परोऽअन्तः पृथिव्याऽअयँयज्ञो यत्र भुवनस्य नाभिः । अयँ सोमो वृष्णोऽअश्वस्य रेतः ब्रह्मायँवाचः परमँव्योम ॥

इयम्। वेदिः। परः। अन्तः। पृथिव्याः। अयम्। यज्ञः। भुवनस्य। नाभिः। अयम्। सोमः। वृष्णः। अश्वस्य। रेतः। ब्रह्मा। अयम्। वाचः। परमम्। व्योमेति विऽओम॥६२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अब यजमान अध्वर्यु से पूछता है कि [क] (त्वा) = आपसे मैं (पृथिव्याः) = पृथिवी के (परमन्तम्) = परले सिरे को पृच्छामि पूछता हूँ। यहाँ यज्ञवेदि पर जहाँ हम बैठे हैं यह पृथिवी का एक सिरा हो तो इसका परला सिरा कहाँ होगा ? [ख] उत्तर देते हुए अध्वर्यु कहते हैं कि (इयं वेदिः) = यह वेदि ही तो (पृथिव्याः) = पृथिवी का (परः अन्तः) = परला अन्त है, क्योंकि वृत्ताकार होने से पृथिवी जहाँ से प्रारम्भ होती है, वहीं आकर समाप्त होगी । वृत्ताकार वस्तु की परिधि का जहाँ से प्रारम्भ मानें वहीं उसका अन्त भी है । पृथिवी की वृत्ताकारिता को इससे अधिक सुन्दर प्रकार से प्रतिपादित कैसे किया जा सकता है? २. दूसरा प्रश्न है पृच्छामि मैं पूछता हूँ उस वस्तु को (यत्र) = जिसमें (भुवनस्य) = इस भुवन का नाभिः = बन्धन है, आधार है, अर्थात् किस वस्तु के न होने पर यह लोक नष्ट हो जाएगा? उत्तर देते हुए कहते हैं (अयं यज्ञः) = यह यज्ञ-सर्वव्यापक प्रभु [यज्ञो वै विष्णुः] (भुवनस्य नाभिः) = इस भुवन के आधार हैं। प्रभु के सर्वस्व त्याग ने ही ब्रह्माण्ड को धारण किया हुआ है। ३. तीसरा प्रश्न पूछता हुआ वह (वृष्णः) = शक्तिशाली (अश्वस्य) = कर्मव्याप्त पुरुष की रेतः-शक्ति को (पृच्छामि) = कहता है कि मैं जानना चाहता हूँ। इस पुरुष की शक्ति का रहस्य किस वस्तु में है ? उत्तर देते हुए अध्वर्यु कहते हैं कि (अयं सोमः) = सोम-शरीर में रस- रुधिरादिक्रम से उत्पन्न होनेवाला वीर्य ही (वृष्णः) = शक्तिशाली लोगों पर सुखों की वर्षा करनेवाले अश्वस्य कर्मव्याप्त पुरुष की (रेतः) = शक्ति है। सोम की रक्षा के अनुपात में ही वह सशक्त बनता है। ४. चौथा प्रश्न है कि मैं (वाच:) = वाणी के परमं व्योम उत्कृष्ट स्थान को पृच्छामि पूछता हूँ। उत्तर देता हुआ अध्वर्यु कहता है (अयं ब्रह्मा) = यह सम्पूर्ण सृष्टि का बनानेवाला प्रजापति ही (वाचः) = वाणी का (परम व्योम) = सर्वोत्कृष्ट स्थान हैं, लोक में भी ब्रह्मा वह कहलाता है जो सम्पूर्ण वेद का ज्ञान रखता है। वह सम्पूर्ण वेद का स्थान = आधार तो बन ही गया। वैसे, सारे वेद उस प्रभु का ही वर्णन करते हैं, ('सर्वे वेदाः यत् पदमामनन्ति') = तथा ('ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्') इन मन्त्रांशों में यही बात कही गई है। उस ब्रह्म-सृष्टिनिर्माता प्रभु का ही वेदमन्त्रों में प्रतिपादन है, अतः ब्रह्मा ही वाणी के (परमं व्योम) = सर्वोत्कृष्ट स्थान है। मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं।
Essence
भावार्थ- 'वेदि' ही पृथिवी का पर- अन्त है।' यज्ञ भुवन का आधार है। सोम शक्ति देने के साथ ज्ञानाग्नि का भी वर्धन करता है और हमें वेदवाणी को समझने की योग्यता प्राप्त कराता है।
Subject
चार आवश्यक प्रश्न