Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 43

65 Mantra
23/43
Devata- राजा देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
द्यौस्ते॑ पृथि॒व्यन्तरि॑क्षं वा॒युश्छि॒द्रं पृ॑णातु ते।सूर्य॑स्ते॒ नक्ष॑त्रैः स॒ह लो॒कं कृ॑णोतु साधु॒या॥४३॥

द्यौः। ते॒। पृ॒थि॒वी। अ॒न्तरि॑क्षम्। वा॒युः। छि॒द्रम्। पृ॒णा॒तु॒। ते॒। सूर्यः॑। ते। नक्ष॑त्रैः। स॒ह। लो॒कम्। कृ॒णो॒तु॒। सा॒धु॒येति॑ साधु॒ऽया ॥४३ ॥

Mantra without Swara
द्यौस्ते पृथिव्यन्तरिक्षँवायुश्छिद्रम्पृणातु ते । सूयस्ते नक्षत्रैः सह लोकङ्कृणोतु साधुया ॥

द्यौः। ते। पृथिवी। अन्तरिक्षम्। वायुः। छिद्रम्। पृणातु। ते। सूर्यः। ते। नक्षत्रैः। सह। लोकम्। कृणोतु। साधुयेति साधुऽया॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ते) = तेरा (द्यौः) = द्युलोक, (पृथिवी) = पृथिवीलोक, (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्षलोक तथा इस अन्तरिक्षलोक में चलनेवाली (वायुः) = वायु (ते छिद्रम्) = तेरे शरीर में होनेवाले दोषमात्र को (पृणातु) = भर दे, अर्थात् इन सबकी अनुकूलता से तेरे अङ्ग-प्रत्यङ्ग ठीक हों । विकलाङ्गता तो हो ही नहीं । सकलाङ्गता के साथ वे सब अङ्ग अपना-अपना कार्य करने में पूर्ण स्वस्थ हों। यहाँ 'ते-तेरा' यह सम्बन्ध शब्द स्पष्ट कह रहा है कि इन सब लोकों के साथ हमारा अपनापन हो। ये सब हमारे मित्र हों न कि शत्रु । २. (सूर्यः) = यह सूर्य (नक्षत्रैः सह) = अन्य सब नक्षत्रों के साथ (ते लोकम्) = तेरे दर्शन को [लोक दर्शने] तेरी दृष्टिशक्ति को (साधुया कृणोतु) = साधु, समीचीन, उत्तम बना दे। वस्तुत: सूर्य दृष्टिशक्ति बनकर अक्षि में निवास करता है। इस सूर्य की अनुकूलता होने पर हमारी दृष्टिशक्ति के ठीक होने पर हमारा यह संसार भी सुन्दर हो जाता है।
Essence
भावार्थ- द्युलोक, अन्तरिक्षलोक, पृथिवीलोक, वायु, सूर्य तथा नक्षत्र ये सब हमारे अनुकूल होकर हमारे शरीरों को निर्दोष करें तथा हमारी दृष्टिशक्ति को उत्तम करके हमारे संसार को सुन्दर बनाएँ।
Subject
सर्वलोकानुकूल्य