Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 39

65 Mantra
23/39
Devata- अध्यापको देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कस्त्वाछ्य॑ति॒ कस्त्वा॒ विशा॑स्ति॒ कस्ते॒ गात्रा॑णि शम्यति।कऽउ॑ ते शमि॒ता क॒विः॥३९॥

कः। त्वा॒। आछ्य॑ति। कः। त्वा॒। वि। शा॒स्ति॒। कः। ते॒। गात्रा॑णि। श॒म्य॒ति॒। कः। उँ॒ऽइत्यूँ॑। ते॒। श॒मि॒ता। क॒विः ॥३९ ॥

Mantra without Swara
कस्त्वाच्छ्यति कस्त्वा विशास्ति कस्ते गात्राणि शम्यति । कऽउ ते शमिता कविः॥

कः। त्वा। आछ्यति। कः। त्वा। वि। शास्ति। कः। ते। गात्राणि। शम्यति। कः। उँऽइत्यूँ। ते। शमिता। कविः॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु-दर्शन करनेवाले (त्वा) = तुझे (क:) = आनन्दस्वरूप प्रजापति (आछ्यति) = समन्तात् विषयों से छिन्न करता है, छुड़ाता है। प्रभु स्मरण वासनाओं के विनाश का सर्वोत्तम व एकमात्र उपाय है। २. वे (कः त्वा) = आनन्दस्वरूप प्रभु ही तुझे वासनाओं से पृथक् करके (विशास्ति) = विशिष्ट अनुशासन करते हैं, विविध धर्मों का उपदेश करते हैं। और ३. इस उपदेश के द्वारा (कः) = वे आनन्दघन प्रजापति (ते) = तेरे (गात्राणि) = अङ्गों को शम्यति शान्त करते हैं। वासना की उष्णता नष्ट होकर हृदय में शान्ति के राज्य की स्थापना उस प्रभु के द्वारा की जाती है। ४. इस प्रकार वे (कः) = आनन्दमय व अनिर्वचनीय प्रजापति (कवि:) = जो क्रान्तदर्शी हैं, वे (उ) = निश्चय से (ते) = तुझे (शमिता) = शान्ति देनेवाले हैं। प्रभुभक्त का हृदय पवित्र होता है, परिणामतः शान्त होता है। इस शान्तपुरुष को ही वास्तविक सुख का अनुभव होता है।
Essence
भावार्थ- अपने भक्त को प्रभु वासनाओं से विच्छिन्न करते हैं। उसको विशिष्ट अनुशासन करके शान्त अङ्गोंवाला करते हैं। ये क्रान्तदर्शी प्रभु ही वस्तुतः हमें शान्ति का लाभ कराते हैं।
Subject
प्रभु-दर्शक के प्रति प्रभु