Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 30

65 Mantra
23/30
Devata- राजा देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यद्ध॑रि॒णो यव॒मत्ति॒ न पु॒ष्टं प॒शु मन्य॑ते।शू॒द्रा यदर्य॑जारा॒ न पोषा॑य धनायति॥३०॥शू॒द्रा यदर्य॑जारा॒ न पोषा॑य धनायति॥३०॥

यत्। ह॒रि॒णः। यव॑म्। अत्ति॑। न। पु॒ष्टम्। प॒शु। मन्य॑ते। शू॒द्रा। यत्। अर्य्य॑जा॒रेत्यर्य्य॑ऽजारा। न। पोषा॑य। ध॒ना॒य॒ति॒ ॥३० ॥

Mantra without Swara
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टम्पशु मन्यते । शूद्रा यदर्यजारा न पोषाय धनायति ॥

यत्। हरिणः। यवम्। अत्ति। न। पुष्टम्। पशु। मन्यते। शूद्रा। यत्। अर्य्यजारेत्यर्य्यऽजारा। न। पोषाय। धनायति॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यत्) = जब (हरिणः) = राष्ट्र, अर्थात् राष्ट्र का अधिकारी राजा (यवम्) = प्रजा को [विड् वै यवो राष्ट्र हरिणः- श० १३।२।९।८] (अत्ति) = खाने लगता है तब वह (पुष्टम्) = पोषणवाली को, राष्ट्र की उन्नति को (पशु) = [ पशुम् - प्रजा वै पशव:- श०१ |४| ६ | १७ ] प्रजा को (न मन्यते) = आदर नहीं देता। वे पुष्ट प्रजाएँ ही वस्तुतः राष्ट्र की उन्नति का भी मूल है, ऐसा वह नहीं समझता। ऐसा न समझकर वह भारी करों द्वारा व अन्य उपायों द्वारा उनकी सम्पत्ति को हड़पने का प्रयत्न करता है और इस प्रकार अपने ही मूल को समाप्त कर लेता है। ऐसा राजा अपने भोग-विलास को ही महत्त्व देता है, प्रजा के पोषण को नहीं। २. एक (शूद्रा) = दासी (यत्) = जब (अर्यजारा) = स्वामी की 'जारा' बनकर उसकी शक्तियों को जीर्ण करनेवाली होती है तब वह (पोषाय) = वंश-पोषण के लिए (न धनायति) = सन्तान-धन की इच्छा नहीं करती। वहाँ भोगवासना का प्राधान्य होता है, वंशवृद्धि की भावना का वहाँ अभाव होता है। इसी प्रकार जिस राजा में विलास की वृत्ति आ जाती है, वह प्रजोन्नतिरूप धन की कामना से शून्य हो जाता है।
Essence
भावार्थ- जैसे एक दासी अपने स्वामी का उपभोग करती हुई वंशवृद्धि की कामनावाली नहीं होती, उसी प्रकार एक विलासी वृत्तिवाला राजा प्रजा को अत्यधिक कर आदि द्वारा खाता हुआ प्रजा -पोषण को महत्त्व नहीं देता ।
Subject
हरिण