Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 3

65 Mantra
23/3
Devata- परमेश्वरो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ऽइद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑। यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चत॒ु॑ष्पदः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥३॥

यः। प्रा॒ण॒तः। नि॒मि॒ष॒त इति॑ निऽमिष॒तः। म॒हि॒त्वेति॑ महि॒ऽत्वा। एकः॑। इत्। राजा॑। जग॑तः। ब॒भूव॑। यः। ईशे॑। अ॒स्य। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदः॑। चतु॑ष्पदः। चतुः॑पद इति॒ चतुः॑पदः। कस्मै॑। दे॒वाय॑। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒ ॥३ ॥

Mantra without Swara
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । यऽईशेऽअस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

यः। प्राणतः। निमिषत इति निऽमिषतः। महित्वेति महिऽत्वा। एकः। इत्। राजा। जगतः। बभूव। यः। ईशे। अस्य। द्विपद इति द्विऽपदः। चतुष्पदः। चतुःपद इति चतुःपदः। कस्मै। देवाय। हविषा। विधेम॥३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यः) = जो प्रभु (प्राणतः) = प्राण धारण करनेवाले तथा (निमिषतः) = सदा आँखों को बन्द करके रहनेवाले (जगतः) = दो भागों में विभक्त जगत् का (महित्वा) = अपनी महिमा से (एक: इत्) = अकेला ही (राजा) = नियन्त्रण करनेवाला है। संसार स्थूलतया दो भागों में विभक्त है। [क] मनुष्यादि प्राणी जो प्राणधारण कर रहे हैं तथा [ख] वृक्षादि जो सदा आँखों को बन्द करके सुप्तावस्था में हैं। प्रभु इस सम्पूर्ण संसार को व्यवस्थित कर रहे हैं। उन्हें अपने इस शासनकार्य में किसी अन्य चेतन की सहायता की आवश्यकता नहीं । वे स्वयं ही शासन कर रहे हैं। उनकी महिमा महान् है। २. (यः) = जो प्रभु (अस्य) = इस (द्विपदः) = दो पैरवालों के, पक्षियों के तथा (चतुष्पदः) = चार पैरवाले पशुओं के (ईशे) = ऐश्वर्य का कारण है। शहद की मक्खियाँ जो शहद बनाती हैं, चील जो आकाश में घण्टों पंखों को फैलाये उड़ती रहती है, सिंह जो तीव्रतर धारा को सीधा पार कर जाता है, यह सब प्रभु का ही ऐश्वर्य है। मनुष्य परमेश्वर प्रदत्त वासना से न चलकर बुद्धि से चलता है। इस बुद्धि के विकास के साथ-साथ वह उन्नत होता चलता है और उन सब पशु-पक्षियों को पराजित करके आगे बढ़ जाता है। वास्तव में तो प्रभु ने मनुष्य के लिए उस उस पशु-पक्षी में उस-उस ऐश्वर्य को आदर्श के रूप में रखा है कि तूने यहाँ पहुँचना है। उदाहरणार्थ ('वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् । वेद नावः समुद्रियः') = जो अन्तरिक्ष में उड़ते हुए पक्षियों के उड़ने के तत्त्व को समझता है वह आकाशीय विमान और समुद्र में चलनेवाली नौकाओं को भी बना सकता है । ३. इस पशु-पक्षियों में ऐश्वर्य को स्थापित करनेवाले (कस्मै) = आनन्दस्वरूप (देवाय) = सब कुछ देनेवाले प्रभु के लिए (हविषा) = त्यागपूर्वक अदन से (विधेम) = हम पूजा करें।
Essence
भावार्थ- प्रभु द्वारा पशु-पक्षियों में प्राप्त करायी गई उस-उस प्रवीणता को हम भी प्राप्त करने का प्रयत्न करें। इसके लिए प्रभु का उपासन करें, प्रभु के उपासन के लिए 'हविर्भुक्' बनें।
Subject
ईश