Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 26

65 Mantra
23/26
Devata- श्रीर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वामे॑ना॒मुच्छ्रा॑पय गि॒रौ भा॒रꣳ हर॑न्निव। अथा॑स्यै॒ मध्य॑मेधता शी॒ते वाते॑ पु॒नन्नि॑व॥२६॥

ऊ॒र्ध्वाम्। ए॒ना॒म्। उत्। श्रा॒प॒य॒। गि॒रौ। भा॒रम्। हर॑न्नि॒वेति॒ हर॑न्ऽइव। अथ॑। अ॒स्यै॒। मध्य॑म्। ए॒ध॒ता॒म्। शी॒ते। वाते॑ पु॒नन्नि॒वेति॑ पु॒नन्ऽइ॑व ॥२६ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वमेनामुच्छ्रापय गिरौ भारँ हरन्निव । अथास्य मध्यमेधताँ शीते वाते पुनन्निव ॥

ऊर्ध्वाम्। एनाम्। उत्। श्रापय। गिरौ। भारम्। हरन्निवेति हरन्ऽइव। अथ। अस्यै। मध्यम्। एधताम्। शीते। वाते पुनन्निवेति पुनन्ऽइव॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्रों में राजा व प्रजा को राष्ट्र के माता-पिता के रूप में चित्रित किया है। प्रस्तुत मन्त्र में राजा के लिए कहते हैं कि हे राजन् ! (गिरौ भारं हरन् इव) = पर्वत पर भार को ले जानेवाले की भाँति तू (एनाम्) = इस प्रजा को (ऊर्ध्वाम्) = ऊपर, उन्नत स्थिति में, (उच्छ्रापय) = उठाकर उन्नत कर । 'पर्वत पर भार ले जानेवाले की भाँति उच्छ्रित कर इस उपमा में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। [क] एक तो यह कि पर्वत पर चढ़ना ही कठिन है और भार लेकर ऊपर जाना तो बहुत ही कठिन है। इसी प्रकार प्रजा को उन्नत करना, अर्थात् राजकर्त्तव्य को निभाना कोई सुगम कार्य नहीं है, [ख] दूसरा यह कि भार को ऊपर ले-जानेवाला स्वयं तो ऊपर पहुँचता ही है, इसी प्रकार प्रजा को उन्नत करनेवाला राजा भी नैतिक दृष्टिकोण से उन्नत होता है। २. हे राजन् ! इस प्रजा की उन्नति का, शिक्षित करने का परिणाम यह हो कि (अथ) = अब (अस्यै) = इस प्रजा के लिए (मध्यम्) = [श्रीर्वै राष्ट्रस्य मध्यम्-श० ३।३।१।४] श्री = धनसम्पत्ति (एधताम्) = बढ़े। किसी भी राष्ट्र में प्रजा की स्थिति का अच्छा होना मूलरूप से उसकी श्री के विकास से ही आँका जाता है। ३. तू इस प्रजा को (शीते) = [श्येङ् वृद्धौ] बढ़ी हुई (वाते) = वायु में (पुनन् इव) = भूसे से गेहूँ को पृथक् करते हुए की भाँति हो। जैसे बढ़ी हुई वायु में कोई भी अन्न को गाहनेवाला छाज से फटकता है और भूसे को गेहूँ से पृथक् कर देता है। उसी प्रकार तू प्रजाओं से आर्य और दस्युओं को पृथक्-पृथक् करनेवाला हो। राजा ने यह दस्यु व आर्यों का अलग-अलग जानने की क्रिया 'शीते वाते' = शान्त गति के द्वारा करनी है। प्रजा में अन्याय व अनुचित दण्ड के भय की उद्विग्नता न छा जाए।
Essence
भावार्थ - राजा के तीन मौलिक कर्त्तव्य हैं [क] प्रजा की स्थिति को उन्नत करना, उसमें शिक्षा आदि का प्रसार करना, [ख] इसके श्री का विकास करना व [ग] आर्य और दस्युओं को अलग-अलग जानना ।
Subject
राज-कर्त्तव्य त्रयी