Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 24

65 Mantra
23/24
Devata- भूमिसूर्यौ देवते Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
मा॒ता च॑ ते पि॒ता च॒ तेऽग्रं॑ वृ॒क्षस्य॑ रोहतः। प्रति॑ला॒मीति॑ ते पि॒ता ग॒भे मु॒ष्टिम॑तꣳसयत्॥२४॥

मा॒ता। च॒। ते॒। पि॒ता। च॒। ते॒। अग्र॑म्। वृ॒क्षस्य॑। रो॒ह॒तः॒। प्रति॑लामि। इति॑। ते॑। पि॒ता। ग॒भे। मु॒ष्टिम्। अ॒त॒ꣳस॒य॒त्॥२४ ॥

Mantra without Swara
माता च ते पिता च तेग्रँ वृक्षस्य रोहतः । प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमतँसयत् ॥

माता। च। ते। पिता। च। ते। अग्रम्। वृक्षस्य। रोहतः। प्रतिलामि। इति। ते। पिता। गभे। मुष्टिम्। अतꣳसयत्॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. राष्ट्र में प्रजा माता है जो राष्ट्र का निर्माण करती है और राजा पिता है जिसका काम राष्ट्र की रक्षा करना है। ये दोनों मिलकर ही राष्ट्र की उन्नति का साधन कर पाते हैं, अतः मन्त्र में कहते हैं कि हे राष्ट्र ! (ते माता च) = तेरा निर्माण करनेवाली यह प्रजा, (पिता च ते) = और तेरी रक्षा करनेवाला यह राजा (वृक्षस्य अग्रम्) = राष्ट्रवृक्ष के अग्रभाग पर, अर्थात् राष्ट्रोन्नति के शिखर पर (रोहतः) = आरोहण करते हैं। [श्रीर्वै राष्ट्रस्य अग्रम् - श० १३ । २।९।७] 'श्री' ही राष्ट्रवृक्ष का शिखर है, अतः ये राष्ट्र को अत्यन्त श्रीसम्पन्न करते हैं । २. और हे राष्ट्र ! (प्रतिलाम इति) = [तिल स्नेहने] प्रकर्षेण स्नेह करता हूँ, इस भावना से ही (ते पिता) = तेरा रक्षक यह राजा (गभे) = [ विड् वै गभः] ऐश्वर्यसम्पन्न प्रजाओं के अन्दर (मुष्टिम्) = [मोषणात् नि० ६।१।१] चोरी की वृत्ति को (अतंसयत्) = कम्पित कर दूर करवा [Shakes away] देता है। मनु के अनुसार राजा चोर को हस्तच्छेदादि दण्ड देता है [(तत्तदेव हरेदस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः) - मनु] ऐसे दण्ड से प्रजा चोरी आदि पापों की ओर झुकाववाली नहीं रहती । वस्तुतः जब राजा को राष्ट्र के प्रति स्नेह होता है तब वह राष्ट्र में से चोरी आदि को दूर करने का प्रयत्न करता है। की
Essence
भावार्थ - राष्ट्र की माता 'प्रजा' है तो पिता 'राजा' है। ये दोनों मिलकर राष्ट्रवृक्ष श्री का वर्धन करते हैं। राजा राष्ट्र में से चोरी को कम्पित कर दूर भगा देता है।
Subject
स्तेय-दण्ड [ चोरी का नाश ]