Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 20

65 Mantra
23/20
Devata- राजप्रजे देवते Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ताऽउ॒भौ च॒तुरः॑ प॒दः स॒म्प्रसा॑रयाव स्व॒र्गे लो॒के प्रोर्णु॑वाथां॒ वृषा॑ वा॒जी रे॑तो॒धा रेतो॑ दधातु॥२०॥

तौ। उ॒भौ। च॒तुरः॑। प॒दः। स॒म्प्रसा॑रया॒वेति॑ स॒म्ऽप्रसा॑रयाव। स्व॒र्ग इति॑ स्वः॒ऽगे। लो॒के। प्र। ऊ॒र्णु॒वा॒था॒म्। वृषा॑। वा॒जी। रे॒तो॒धा इति॑ रेतः॒ऽधाः। रेतः॑। द॒धा॒तु॒ ॥२० ॥

Mantra without Swara
ताऽउभौ चतुरः पदः सम्प्र सारयाव स्वर्गे लोके प्रोर्णुवाथाँवृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ॥

तौ। उभौ। चतुरः। पदः। सम्प्रसारयावेति सम्ऽप्रसारयाव। स्वर्ग इति स्वःऽगे। लोके। प्र। ऊर्णुवाथाम्। वृषा। वाजी। रेतोधा इति रेतःऽधाः। रेतः। दधातु॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के 'गणपति, प्रियपति व निधिपति' का उपासक प्रभु से कहता है कि (ता उभौ) = वे दोनों आप और मैं [ राजा व प्रजा] (चतुरः पद:) = चार पगों को (संप्रसारयाव) = फैलाएँ, अर्थात् चारों प्राप्तव्य पुरुषार्थों को, धर्मार्थ काम मोक्ष को विस्तृत करनेवाले बनें। २. आपकी कृपा से धर्मार्थ-काम-मोक्ष को सिद्ध करनेवाले बनें और स्वर्गे लोके स्वर्गलोक में, सुखमयलोक में (प्रोर्णुवाथाम्) = अपने को आच्छादित करें, अर्थात् सुखमयलोक में निवास करनेवाले बनें। आप तो सुखस्वरूप हैं ही, मैं भी आपकी कृपा से सुखमयलोक में रहनेवाला बनूँ। ३. आप (वृषा) = सबपर सुखों की वर्षा करनेवाले (वाजी) = शक्तिशाली व रेतोधावीर्यशक्ति का धारण करनेवाले हैं। हे प्रभो! आप कृपा करके (रेतः दधातु) राजा व प्रजा में शक्ति धारण कीजिए ।
Essence
भावार्थ- प्रभु से मिलकर मैं, प्रभुकृपा से 'धर्मार्थकाम-मोक्ष' इन चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करूँ। अपने को स्वर्गलोक में स्थापित करूँ। 'वृषा, वाजी, रेतोधा' प्रभु राजा व प्रजा में रेतस् का आधान करें, अर्थात् प्रभु राजा व प्रजा को शक्तिशाली बनाएँ।
Subject
चार पुरुषार्थ