Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 18

65 Mantra
23/18
Devata- प्राणादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑पा॒नाय॒ स्वाहा॑ व्या॒नाय॒ स्वाहा॑। अम्बे॒ऽअम्बि॒केऽम्बा॑लिके॒ न मा॑ नयति॒ कश्च॒न। सस॑स्त्यश्व॒कः सुभ॑द्रिकां काम्पीलवा॒सिनी॑म्॥१८॥

प्रा॒णाय॑। स्वाहा॑। अ॒पा॒नाय॑। स्वाहा॑। व्या॒नायेति॑ विऽआ॒नाय॑। स्वाहा॑। अम्बे॑। अम्बि॑के। अम्बा॑लिके। न। मा॒। न॒य॒ति॒। कः। च॒न। सस॑स्ति। अ॒श्व॒कः। सुभ॑द्रिका॒मिति॒ सुऽभ॑द्रिकाम्। का॒म्पी॒ल॒वा॒सिनी॒मिति॑ काम्पीलऽ वा॒सिनी॑म् ॥१८ ॥

Mantra without Swara
प्राणाय स्वाहाऽअपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा अम्बे अम्बिके म्बालिके न मा नयति कश्चन । ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम् ॥

प्राणाय। स्वाहा। अपानाय। स्वाहा। व्यानायेति विऽआनाय। स्वाहा। अम्बे। अम्बिके। अम्बालिके। न। मा। नयति। कः। चन। ससस्ति। अश्वकः। सुभद्रिकामिति सुऽभद्रिकाम्। काम्पीलवासिनीमिति काम्पीलऽ वासिनीम्॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की ज्ञानवाणियों का ध्यान करते हुए कहते हैं कि (प्राणाय) = प्राणशक्ति की वृद्धि के लिए अग्नि का वर्णन करनेवाली, ऋग्वाणी जो (अम्बा) = माता के समान हितकर है, यह (स्वाहा) = [सुआह] उत्तमता से कही गई है। २. (अपानाय) = अपान-दोषों के दूरीकरण की शक्ति की वृद्धि के लिए यह वायु का वर्णन करनेवाली यजुर्वाणी जो (अम्बिका) = दादी [पितामही - द०] के समान हितकर है, यह (स्वाहा) = उत्तमता से कही गई है । ३. (व्यानाय स्वाहा) = [व्यानः सर्वशरीरगः] व्यान के लिए, सारे शरीर को नियन्त्रण में रखने के लिए प्रतिपादित की गई यह सामवाणी सूर्य का वर्णन करती हुई (अम्बालिका) = प्रपितामही के समान हितकर है और इसका उत्तमता से प्रतिपादन हुआ है। ४. हे (अम्बे) =मातृवत् हितकारिणी अग्निविद्या, अम्बिके पितामहीवत् हितकारिणी वायुविद्या तथा अम्बालिके= अतः यहाँ प्रपितामहीवत् हितकारिणी सूर्यविद्ये! ['अबि शब्दे' से ये तीनों शब्द बने हैं, शब्दप्रतिपाद्य विद्या के वाचक हैं] आपकी कृपा से (मा) = मुझे (कश्चन) = संसार का कोई भी विषय या प्रलोभन (न नयति) = धर्म के मार्ग से दूर नहीं ले जाता [Not to be led away ] ५. ज्ञान प्राप्त करके सदा उत्तम क्रियाओं में व्याप्त रहनेवाला [अश् व्याप्तौ] (अश्वक:) = [अश्वः एव अश्वकः स्वार्थे कन् ] क्रियाशील शक्तिशाली पुरुष (सुभद्रिकाम्) = उत्तम कल्याण व सुख को सिद्ध करनेवाली (काम्पीलवासिनीम्) = [कं सुखं पीलयति गृह्णाति तं वा संयाति तां लक्ष्मीम् - द०] सुख-संग्रहण में निवास करनेवाली लक्ष्मी को (ससस्ति) = प्राप्त करके आराम से शयन करता है। 'लक्ष्मीमधिशेते' = लक्ष्मी को प्राप्त करता है, इसी प्रकार (लक्ष्मी ससस्ति) = कल्याणकारिणी लक्ष्मी को प्राप्त करता है।
Essence
भावार्थ- हम प्राण, अपान व व्यान की प्रतिपादिका ज्ञानवाणियों का ग्रहण करें। इन ज्ञानवाणियों को प्राप्त करने पर हमें संसार का कोई प्रलोभन हरा नहीं सकता। ज्ञानानुसार कर्मों में व्याप्त होनेवाला पुरुष कल्याणकारिणी लक्ष्मी को प्राप्त करके आराम से रहता है।
Subject
अम्बा-अम्बिका-अम्बालिका