Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 17

65 Mantra
23/17
Devata- अग्न्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निः प॒शुरा॑सी॒त् तेना॑यजन्त॒ सऽए॒तं लो॒कम॑जय॒द् यस्मि॑न्न॒ग्निः स ते॑ लो॒को भ॑विष्यति॒ तं जे॑ष्यसि॒ पिबै॒ताऽअ॒पः। वा॒युः प॒शुरा॑सी॒त् तेना॑यजन्त॒ सऽए॒तं लो॒कम॑जय॒द् यस्मि॑न् वा॒युः स ते॑ लो॒को भ॑विष्यति॒ तं जे॑ष्यसि॒ पिबै॒ताऽअ॒पः। सूर्यः॑ प॒शुरा॑सी॒त् तेना॑यजन्त॒ सऽए॒तं लो॒कम॑जय॒द् यस्मि॒न्त्सूर्य्यः॒ स ते॑ लो॒को भ॑विष्यति॒ तं जे॑ष्यसि॒ पिबै॒ताऽअ॒पः॥१७॥

अ॒ग्निः। प॒शुः। आ॒सी॒त्। तेन॑। अ॒य॒ज॒न्त॒। सः। ए॒तम्। लो॒कम्। अ॒ज॒य॒त्। यस्मि॑न्। अ॒ग्निः। सः। ते॒। लो॒कः। भ॒वि॒ष्य॒ति॒। तम्। जे॒ष्य॒सि॒। पिब॑। ए॒ताः। अ॒पः। वा॒युः। प॒शुः। आ॒सी॒त्। तेन॑। अ॒य॒ज॒न्त॒। सः। ए॒तम्। लो॒कम्। अ॒ज॒य॒त्। यस्मि॑न्। वा॒युः। सः। ते॒। लो॒कः। भ॒वि॒ष्य॒ति॒। तम्। जे॒ष्य॒सि॒। पिब॑। ए॒ताः। अ॒पः। सूर्यः॑। प॒शुः। आ॒सी॒त्। तेन॑। अ॒य॒ज॒न्त॒। सः। ए॒तम्। लो॒कम्। अ॒ज॒य॒त्। यस्मि॑न्। सूर्य्यः॑। सः। ते॒। लो॒कः। भ॒वि॒ष्य॒ति॒। तम्। जे॒ष्य॒सि॒। पिब॑। ए॒ताः। अ॒पः ॥१७ ॥

Mantra without Swara
अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्त सऽएतँल्लोकमजयद्यस्मिन्नग्निः स ते लोको भविष्यति तञ्जेष्यसि पिबैताऽअपः । वायुः पशुरासीत्तेनायजन्त सऽएतँल्लोकमजयद्यस्मिन्वायुः स ते लोको भविष्यति तञ्जेष्यसि पिबैताऽअपः । सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त सऽएतँलोकमजयद्यस्मिन्त्सूर्यः स ते लोको भविष्यति तञ्जेष्यसि पिबैता अपः ॥

अग्निः। पशुः। आसीत्। तेन। अयजन्त। सः। एतम्। लोकम्। अजयत्। यस्मिन्। अग्निः। सः। ते। लोकः। भविष्यति। तम्। जेष्यसि। पिब। एताः। अपः। वायुः। पशुः। आसीत्। तेन। अयजन्त। सः। एतम्। लोकम्। अजयत्। यस्मिन्। वायुः। सः। ते। लोकः। भविष्यति। तम्। जेष्यसि। पिब। एताः। अपः। सूर्यः। पशुः। आसीत्। तेन। अयजन्त। सः। एतम्। लोकम्। अजयत्। यस्मिन्। सूर्य्यः। सः। ते। लोकः। भविष्यति। तम्। जेष्यसि। पिब। एताः। अपः॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के देवयान मार्ग में देव अधिक-से-अधिक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। सबसे प्रथम इस पृथिवीलोक के ग्यारह देवताओं का मुखिया यह (अग्निः) = अग्निदेव (पशुः आसीत्) = [दृश्य:- द० ] दर्शन व ज्ञान का विषय बनता है। इस अग्निदेव का ज्ञान प्राप्त करके (तेन) = उस अग्निदेव के साथ (अयजन्त) = वे अपना मेल बढ़ाते हैं [यज्-सङ्गतिकरण] । इस अग्नि को अपने विविध यत्नों से उपयुक्त करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः इस अग्नि के ज्ञान व प्रयोग से (सः) = यह अग्नितत्त्व का वेत्ता ज्ञानी पुरुष (एतं लोकम्) = इस पृथिवीलोक को (अजयत्) = जीत लेता है। (यस्मिन् अग्निः) = जिस लोक में यह अग्नि मुख्य देवता है (सः लोक:) = वह लोक (ते) = तेरा (भविष्यति) = हो जाएगा, (तं जेष्यसि) = उस लोक को तू विजय कर लेगा। वस्तुतः बिना ज्ञान के हम इन अग्नि आदि देवों को अपना नहीं बना सकते। इनसे उपयुक्त लाभ नहीं ले सकते। इनका विजय इनके ज्ञान से ही होता है। इसके लिए तू (एताः अप:) = शरीर में रेतरूप से रहनेवाले इन अप्कणों का [ आपः रेतो भूत्वा० ] (पिब) = पान कर। इनको तू शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न कर। २. अग्नि के ज्ञान के (पश्चात् वायुः पशुः आसीत्) = अन्तरिक्षलोक के देवताओं का मुखिया यह वायुदेव ज्ञान का विषय हुआ। इन देवों ने वायु का ज्ञान प्राप्त किया। तेन अयजन्त उस वायुदेव से इन्होंने अपना सङ्ग बढ़ाया। इसे अपने यत्नों व व्यवहार में उपयुक्त किया और अब (सः) = इसने (एतं लोकं अजयत्) = इस वायु के आधारभूत अन्तरिक्षलोक को जीत लिया। इस विजय से (यस्मिन् वायुः) = जिसमें यह वायु मुख्यदेव है (सः लोकः) = वह अन्तरिक्षलोक (ते) = तेरा भविष्यति होगा। (तं जेष्यसि) = उस लोक को तू जीत लेगा । (एता अपः पिब) = तू इन सोमकणों को अपने अन्दर व्याप्त करने का प्रयत्न कर। वायु का ठीक ज्ञान हो जाने पर ही मनुष्य अन्तरिक्षलोक में अपने वायुयान आदि को चला पाता है और इस लोक को जीत लेता है। ३. अब अग्नि व वायु के ज्ञान के पश्चात् इन देवों का (सूर्य:) = द्युलोकस्थ देवों का मुख्यदेव सूर्य (पशुः आसीत्) = दृश्य व ज्ञान का विषय बनता है। ऋग्वेद में इन्होंने अग्नि आदि देवों का ज्ञान प्राप्त किया तो यजुर्वेद में वायु इनके ज्ञान का विषय बना और अब साम में वे सूर्य को ज्ञान का विषय बनाते हैं। ('अग्नेर्वा ऋग्वेदः, वायोर्यजुर्वेदः, सूर्यात् सामवेदः । तेन अयजन्त') = सूर्य के साथ ये विद्वान् अपना सङ्ग बढ़ाते हैं। इसकी किरणों से अपने यन्त्रादि को परिचालित करने का प्रयत्न करते हैं। (सः) = इस सूर्य का ज्ञान प्राप्त करके वह (एतं लोकम्) = इस सूर्य के आधारभूत द्युलोक को (अजयत्) = जीत लेता है। (यस्मिन् सूर्य:) = जिस द्युलोक में यह सूर्य है (सः) = वह (ते लोकः) = तेरा लोक (भविष्यति) = हो जाएगा। (तं जेष्यसि) = उस लोक को तू जीत लेगा। उसके ज्ञान से तू द्युलोक को अपने अनुकूल कर पाएगा, इसके लिए (एता अपः पिब) = इन रेतःकणों को तू अपने अन्दर पीने का प्रयत्न कर।
Essence
भावार्थ- देववृत्तिवाले लोग 'अग्नि वायु-सूर्य' आदि देवों [प्राकृतिक शक्तियों] का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इनके ज्ञान को अपने यन्त्रादि में विनियुक्त करते हैं। अपने हितसाधनों में इन्हें विनियुक्त करते हुए वे इनपर विजय प्राप्त करते हैं। ये सब प्राकृतिक शक्तियाँ देवों के लिए हितकर हो जाती हैं।
Subject
अग्नि-वायु-सूर्य