Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 14

65 Mantra
23/14
Devata- ब्रह्मादेवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सꣳशि॑तो र॒श्मिना॒ रथः॒ सꣳशि॑तो र॒श्मिना॒ हयः॑। सꣳशि॑तो अ॒प्स्वप्सु॒जा ब्र॒ह्मा सोम॑पुरोगवः॥१४॥

सशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। र॒श्मिना॑। रथः॑। सशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। र॒श्मिना॑। हयः॑। सशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒प्सु॒जा इत्य॑प्सु॒ऽजा। ब्र॒ह्मा। सोम॑ऽपुरोगवः ॥१४ ॥

Mantra without Swara
सँशितो रश्मिना रथः सँशितो रश्मिना हयः । सँशितो अप्स्वप्सुजा ब्रह्मा सोमपुरोगवः ॥

सशित इति सम्ऽशितः। रश्मिना। रथः। सशित इति सम्ऽशितः। रश्मिना। हयः। सशित इति सम्ऽशितः। अप्स्वित्यप्ऽसु। अप्सुजा इत्यप्सुऽजा। ब्रह्मा। सोमऽपुरोगवः॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के 'राथ्यो वृषा' ने क्या किया है? उसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि इसके द्वारा रश्मिना ज्ञानरूपी किरणों से युक्त मनरूप लगाम से रथः = यह शरीररूप रथ (संशितः) = शोभित किया गया है [संपूर्व: श्यति : शोभने- उ० ] अथवा चलने में तीक्ष्ण व उत्तम क्रियावाला किया गया है। २. (रश्मिना) = उसी ज्ञान-किरणयुक्त मनरूपी लगाम से (हयः) = इन्द्रियरूप घोड़े (संशितः) = शोभित व तीक्ष्ण क्रियायुक्त किये गये हैं । ३. (अप्सुजा:) = सदा कर्मों में लगा होनेवाला यह (अश्व) [ = कर्मों में व्याप्त पुरुष] (अप्सु) = प्राणों में (संशित:) = शोभित हुआ है। कर्मों से इसकी प्राणशक्ति बढ़ी है। ४. इस प्रकार कर्मों से बढ़ी हुई प्राणशक्तिवाला यह पुरुष (ब्रह्मा) = बड़ा व निर्माता हुआ है, (सोमपुरोगवः) = यह सोम की रक्षा के द्वारा आगे और आगे चलता है [सोमेन पुरः गच्छति ] । सोम की रक्षा के द्वारा यह उसकी ऊर्ध्वगति करनेवाला 'शूद्र [शु+उत्+र] होता है, शरीर में उसका प्रवेश करानेवाला 'वैश्य' बनता है, शरीर को सब क्षतों से बचाने के कारण 'क्षत्रिय' होता है और इस सोम के ज्ञानाग्नि का ईंधन बनने पर 'ब्रह्म'- ज्ञान से दीप्त 'ब्राह्मण' होता है। इस प्रकार यह सोम के द्वारा अधिक- और अधिक उन्नति करता चलता है।
Essence
भावार्थ - रथ और घोड़ों [शरीर व इन्द्रियों] को वश में करके क्रियाशीलता से अपनी शोभा को बढ़ाकर हम ब्रह्मा बनते हैं और सोम की रक्षा से आगे और आगे चलनेवाले बनते हैं।
Subject
सोमपुरोगव